📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Ganesh Puja Committee
राजनीति
पश्चिम बंगाल में गणेश पूजा पंडालों ने राजनीति को दिया मंच, आरजी कार विरोध और सनातन धर्म पर प्रकाश
✍️ Bhaskar English
🗓 14 सित. 2026, 11:15 AM
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पश्चिम बंगाल में इस साल की गणेश पूजा पंडालों में राजनैतिक नारे लगे, जिसमें आरजी कार विरोध और सनातन धर्म की बात की गई।
पश्चिम बंगाल में हर साल आयोजित गणेश पूजा इस वर्ष स्पष्ट रूप से राजनैतिक रंग ले चुकी है, जहाँ कई पंडालों पर ऐसे बैनर और सजावट लगे हैं जो वर्तमान राजनीतिक बहसों को उजागर करते हैं। पंडाल आयोजकों ने इस धार्मिक मंच को पारंपरिक प्रतीकों से परे संदेश पहुँचाने के लिए इस्तेमाल किया है।
सबसे प्रमुख विषयों में से एक है पूर्व राज्य मंत्री आर.जी. कार के खिलाफ हालिया विरोध प्रदर्शन, जिनकी नीतियों को जनता ने चुनौती दी है। कुछ पंडालों में उन प्रदर्शनों की भावनाओं को दर्शाने वाले नारे और चित्र शामिल किए गए हैं, जिससे उत्सव एक दृश्य टिप्पणी बन गया है।
एक और प्रमुख कथा "सनातन धर्म" की वापसी की वकालत है, जिसे कुछ सांस्कृतिक समूह शुद्ध हिन्दू परम्परा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस विषय को पंडालों में धार्मिक प्रतीकों और श्लोकों के माध्यम से दिखाया गया है, जो उत्सव को व्यापक सांस्कृतिक पुनरुत्थान के साथ जोड़ता है।
स्थानीय प्राधिकरणों ने इन राजनैतिक संकेतों को नोट किया है, पर हस्तक्षेप नहीं किया, क्योंकि सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्व दिया जाता है। विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रवृत्ति राज्य में धार्मिक उत्सवों और राजनैतिक विमर्श के बीच बढ़ते मेल को दर्शाती है।
सबसे प्रमुख विषयों में से एक है पूर्व राज्य मंत्री आर.जी. कार के खिलाफ हालिया विरोध प्रदर्शन, जिनकी नीतियों को जनता ने चुनौती दी है। कुछ पंडालों में उन प्रदर्शनों की भावनाओं को दर्शाने वाले नारे और चित्र शामिल किए गए हैं, जिससे उत्सव एक दृश्य टिप्पणी बन गया है।
एक और प्रमुख कथा "सनातन धर्म" की वापसी की वकालत है, जिसे कुछ सांस्कृतिक समूह शुद्ध हिन्दू परम्परा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस विषय को पंडालों में धार्मिक प्रतीकों और श्लोकों के माध्यम से दिखाया गया है, जो उत्सव को व्यापक सांस्कृतिक पुनरुत्थान के साथ जोड़ता है।
स्थानीय प्राधिकरणों ने इन राजनैतिक संकेतों को नोट किया है, पर हस्तक्षेप नहीं किया, क्योंकि सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्व दिया जाता है। विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रवृत्ति राज्य में धार्मिक उत्सवों और राजनैतिक विमर्श के बीच बढ़ते मेल को दर्शाती है।