📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Subhrasingh
बिज़नेस
RBI SAMVAD 2026 में एआई और भू‑राजनीतिक तनाव को वित्तीय स्थिरता के बढ़ते खतरे के रूप में चेतावनी
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🗓 21 अक्टू. 2026, 02:16 PM
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RBI SAMVAD 2026 सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि वित्त में तेज़ एआई अपनाना और बढ़ते भू‑राजनीतिक तनाव भारत की वित्तीय स्थिरता के लिए नई चुनौतियां पेश कर रहे हैं।
रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के SAMVAD 2026 मंच पर वरिष्ठ अर्थशास्त्री और बाजार विश्लेषकों ने दो उभरते जोखिमों को उजागर किया, जो देश की वित्तीय प्रणाली को अस्थिर कर सकते हैं। पहला जोखिम वित्तीय क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का तेज़ी से अपनाना है, जो दक्षता बढ़ाता है लेकिन मॉडल जोखिम, डेटा सुरक्षा और एआई‑आधारित निर्णयों में त्रुटि होने पर प्रणालीगत contagion की संभावना को भी बढ़ाता है।
दूसरा जोखिम वैश्विक भू‑राजनीतिक तनावों में वृद्धि है, जिसमें व्यापार विवाद और क्षेत्रीय संघर्ष शामिल हैं, जो पूँजी प्रवाह में व्यवधान, मुद्रा अस्थिरता और सीमा‑पार फंडिंग चैनलों में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे बाहरी झटके उभरते बाजारों में तनाव को बढ़ा सकते हैं, यदि समय पर निगरानी न की जाए।
इन दोनों जोखिमों के मद्देनज़र, वक्ताओं ने RBI से एआई अनुप्रयोगों के लिए नियामक ढाँचा सुदृढ़ करने और भू‑राजनीतिक शॉक को शामिल करते हुए तनाव‑परीक्षण परिदृश्य विकसित करने का आग्रह किया। उन्होंने घरेलू नियामकों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बीच सूचना‑साझाकरण को भी बढ़ाने की सलाह दी, ताकि संभावित प्रभावों का पूर्वानुमान और रोकथाम की जा सके।
भले ही इस मंच पर कोई विशिष्ट नीति घोषणा नहीं हुई, लेकिन यह स्पष्ट था कि सक्रिय निगरानी और मजबूत जोखिम‑मूल्यांकन उपकरण भारत की वित्तीय स्थिरता को इन नई चुनौतियों से बचाने के लिए आवश्यक हैं।
दूसरा जोखिम वैश्विक भू‑राजनीतिक तनावों में वृद्धि है, जिसमें व्यापार विवाद और क्षेत्रीय संघर्ष शामिल हैं, जो पूँजी प्रवाह में व्यवधान, मुद्रा अस्थिरता और सीमा‑पार फंडिंग चैनलों में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे बाहरी झटके उभरते बाजारों में तनाव को बढ़ा सकते हैं, यदि समय पर निगरानी न की जाए।
इन दोनों जोखिमों के मद्देनज़र, वक्ताओं ने RBI से एआई अनुप्रयोगों के लिए नियामक ढाँचा सुदृढ़ करने और भू‑राजनीतिक शॉक को शामिल करते हुए तनाव‑परीक्षण परिदृश्य विकसित करने का आग्रह किया। उन्होंने घरेलू नियामकों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बीच सूचना‑साझाकरण को भी बढ़ाने की सलाह दी, ताकि संभावित प्रभावों का पूर्वानुमान और रोकथाम की जा सके।
भले ही इस मंच पर कोई विशिष्ट नीति घोषणा नहीं हुई, लेकिन यह स्पष्ट था कि सक्रिय निगरानी और मजबूत जोखिम‑मूल्यांकन उपकरण भारत की वित्तीय स्थिरता को इन नई चुनौतियों से बचाने के लिए आवश्यक हैं।