📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Sharada Prasad CS from Berkeley, India
मौसम
उत्तarakhand में घटते ग्लेशियर, बाढ़‑भूस्खलन और हिमस्खलन जोखिम
✍️ The New Indian Express
🗓 06 सित. 2026, 02:25 AM
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उत्तarakhand में ग्लेशियरों के पीछे हटने से गलेशियल‑लेक आउटब्रस्ट फ़्लड और हिमस्खलन का खतरा बढ़ा है, जिससे राज्य ने जोखिम क्षेत्रों का मानचित्रण कर निवारक उपायों को सुदृढ़ करने की मांग की है।
उत्तराखंड के ऊँचे हिमालयी जलधाराओं में जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संकेत दिख रहे हैं, जहाँ पिछले दस वर्षों में कई ग्लेशियरों के पीछे हटने की रिपोर्टें आई हैं।
ग्लेशियरों के सिकुड़ने से गलेशियल‑लेक आउटब्रस्ट फ़्लड (GLOF) और हिमस्खलन का खतरा बढ़ गया है, विशेषकर चमोली, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी जिलों में जहाँ पिघला हुआ पानी अस्थिर मोरैन डैम के पीछे जमा होता है।
भारतीय रिमोट सेंसिंग संस्थान और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि मध्यम तापमान वृद्धि भी अचानक जल निकासी का कारण बन सकती है, जिससे अलाक्नंदा और भागीरथी नदियों के नीचे बसे गाँवों को जोखिम हो सकता है।
राज्य सरकार ने जोखिम वाले क्षेत्रों का मानचित्रण शुरू किया है और गांवों को शीघ्र चेतावनी प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित किया है, साथ ही केंद्र सरकार से अतिरिक्त फंड की मांग की है ताकि निवारक बुनियादी ढांचा मजबूत किया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक अनुकूलन के लिए उत्सर्जन में कमी और स्थानीय तैयारी दोनों आवश्यक हैं, ताकि आने वाले दशकों में जान‑माल की हानि से बचा जा सके।
ग्लेशियरों के सिकुड़ने से गलेशियल‑लेक आउटब्रस्ट फ़्लड (GLOF) और हिमस्खलन का खतरा बढ़ गया है, विशेषकर चमोली, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी जिलों में जहाँ पिघला हुआ पानी अस्थिर मोरैन डैम के पीछे जमा होता है।
भारतीय रिमोट सेंसिंग संस्थान और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि मध्यम तापमान वृद्धि भी अचानक जल निकासी का कारण बन सकती है, जिससे अलाक्नंदा और भागीरथी नदियों के नीचे बसे गाँवों को जोखिम हो सकता है।
राज्य सरकार ने जोखिम वाले क्षेत्रों का मानचित्रण शुरू किया है और गांवों को शीघ्र चेतावनी प्रणाली अपनाने के लिए प्रेरित किया है, साथ ही केंद्र सरकार से अतिरिक्त फंड की मांग की है ताकि निवारक बुनियादी ढांचा मजबूत किया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक अनुकूलन के लिए उत्सर्जन में कमी और स्थानीय तैयारी दोनों आवश्यक हैं, ताकि आने वाले दशकों में जान‑माल की हानि से बचा जा सके।