📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Kim Traynor
शिक्षा
विद्यार्थियों ने किया समर्थन, #SchoolThikKaro आंदोलन ने स्कूल सुधार की माँग
✍️ BBC
🗓 21 अग. 2026, 05:48 AM
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‘कॉकरोच’ प्रदर्शकों द्वारा शुरू किया गया #SchoolThikKaro आंदोलन, स्कूलों की मरम्मत की माँग कर रहा है, और छात्र भी इस मांग से सहमत हैं, बीबीसी ने बताया।
#SchoolThikKaro हैशटैग से पहचाना गया एक आंदोलन भारत के कई शहरों में सार्वजनिक स्कूलों की तत्काल मरम्मत और उन्नयन की मांग कर रहा है। मीडिया रिपोर्टों में इसे “कॉकरोच” प्रदर्शकों के रूप में वर्णित किया गया है, जो कहते हैं कि कई स्कूलों की इमारतें ढहती स्थिति में हैं, सुविधाएँ अपर्याप्त हैं और सुरक्षा की कमी से सीखने में बाधा आती है।
भंगुर दीवारें, रिसते छत और अपर्याप्त स्वच्छता जैसी समस्याओं को उजागर करने वाले रैलियों और सोशल‑मीडिया पोस्टों के बाद इस अभियान को गति मिली है। प्रदर्शक राज्य और केंद्र सरकारों से विशेष फंड आवंटित करने और कड़े रखरखाव मानकों को लागू करने की मांग कर रहे हैं।
एक उल्लेखनीय पहल में, स्कूल के छात्र स्वयं इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं और “स्कूल ठीक करो” की पुकार को दोहरा रहे हैं। कक्षाओं में किए गए सर्वेक्षण और साक्षात्कारों में छात्रों ने खराब बुनियादी ढाँचे के प्रति अपनी निराशा व्यक्त की है।
बीबीसी ने इस विरोध पर रिपोर्ट किया, यह बताते हुए कि कार्यकर्ताओं और छात्रों के संयुक्त दबाव से स्थानीय शिक्षा विभाग बजट आवंटन की समीक्षा कर रहे हैं। जबकि अधिकारियों ने अभी तक ठोस नीति परिवर्तन की घोषणा नहीं की है, स्कूल स्थितियों पर चर्चा तेज़ी से बढ़ रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि निरंतर सार्वजनिक ध्यान से विधायी कार्रवाई संभव हो सकती है, विशेषकर जब यह मुद्दा सरकार की शैक्षिक सुधार की प्रतिबद्धताओं के साथ मेल खाता है।
भंगुर दीवारें, रिसते छत और अपर्याप्त स्वच्छता जैसी समस्याओं को उजागर करने वाले रैलियों और सोशल‑मीडिया पोस्टों के बाद इस अभियान को गति मिली है। प्रदर्शक राज्य और केंद्र सरकारों से विशेष फंड आवंटित करने और कड़े रखरखाव मानकों को लागू करने की मांग कर रहे हैं।
एक उल्लेखनीय पहल में, स्कूल के छात्र स्वयं इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं और “स्कूल ठीक करो” की पुकार को दोहरा रहे हैं। कक्षाओं में किए गए सर्वेक्षण और साक्षात्कारों में छात्रों ने खराब बुनियादी ढाँचे के प्रति अपनी निराशा व्यक्त की है।
बीबीसी ने इस विरोध पर रिपोर्ट किया, यह बताते हुए कि कार्यकर्ताओं और छात्रों के संयुक्त दबाव से स्थानीय शिक्षा विभाग बजट आवंटन की समीक्षा कर रहे हैं। जबकि अधिकारियों ने अभी तक ठोस नीति परिवर्तन की घोषणा नहीं की है, स्कूल स्थितियों पर चर्चा तेज़ी से बढ़ रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि निरंतर सार्वजनिक ध्यान से विधायी कार्रवाई संभव हो सकती है, विशेषकर जब यह मुद्दा सरकार की शैक्षिक सुधार की प्रतिबद्धताओं के साथ मेल खाता है।