📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Shiraz Husain
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राजस्थान हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की अनिवार्य सेवानिवृत्ति की समीक्षा के लिए पाँच जजों की समिति बनाई
✍️ Amar Ujala · Jaipur
🗓 17 अक्टू. 2026, 07:15 AM
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राजस्थान हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की अनिवार्य सेवानिवृत्ति से जुड़े मामलों की समीक्षा के लिये पाँच जजों की समिति गठित की, जिसमें पहले की दो समितियों को सौंपे गये मामलों को भी शामिल किया गया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की अनिवार्य सेवानिवृत्ति से संबंधित प्रावधानों की समीक्षा करने के लिये पाँच जजों की समिति गठित करने का निर्णय लिया है। यह समिति उन सभी मामलों की जांच करेगी जिनमें सेवानिवृत्ति आयु या प्रक्रिया संबंधी प्रश्न उठाए गए हैं।
समिति का कार्यक्षेत्र पहले बनायी गयी दो अलग‑अलग समितियों को सौंपे गये मामलों को भी सम्मिलित करता है। इन मामलों को एक ही मंच पर लाकर उच्च न्यायालय का उद्देश्य सेवानिवृत्ति नियमों की एकसमान और स्पष्ट व्याख्या प्रदान करना है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस समीक्षा के परिणामस्वरूप राज्य के वरिष्ठ जजों और निचले स्तर के न्यायाधीशों की कार्यकाल नीति में बदलाव आ सकता है, जिससे सेवा नियमों में संशोधन की संभावना बनती है। समिति की रिपोर्ट के लिए अभी तक कोई निश्चित समय सीमा नहीं बताई गई है, लेकिन यह रिपोर्ट उच्च न्यायालय को आगे के आदेशों के लिये प्रस्तुत की जाएगी।
यह कदम न्यायपालिका के भीतर अनुभव और नियत सेवानिवृत्ति सीमा के संतुलन को लेकर बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है और प्रशासनिक मुद्दों को सुलझाने में उच्च न्यायालय की सक्रिय भूमिका को उजागर करता है।
समिति का कार्यक्षेत्र पहले बनायी गयी दो अलग‑अलग समितियों को सौंपे गये मामलों को भी सम्मिलित करता है। इन मामलों को एक ही मंच पर लाकर उच्च न्यायालय का उद्देश्य सेवानिवृत्ति नियमों की एकसमान और स्पष्ट व्याख्या प्रदान करना है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस समीक्षा के परिणामस्वरूप राज्य के वरिष्ठ जजों और निचले स्तर के न्यायाधीशों की कार्यकाल नीति में बदलाव आ सकता है, जिससे सेवा नियमों में संशोधन की संभावना बनती है। समिति की रिपोर्ट के लिए अभी तक कोई निश्चित समय सीमा नहीं बताई गई है, लेकिन यह रिपोर्ट उच्च न्यायालय को आगे के आदेशों के लिये प्रस्तुत की जाएगी।
यह कदम न्यायपालिका के भीतर अनुभव और नियत सेवानिवृत्ति सीमा के संतुलन को लेकर बढ़ती चिंताओं को दर्शाता है और प्रशासनिक मुद्दों को सुलझाने में उच्च न्यायालय की सक्रिय भूमिका को उजागर करता है।