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23 Sep 2026
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खाड़ी देशों के संघर्ष का असर
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खाड़ी देशों के संघर्ष का असर

✍️ Reporter: Ankit Raj 🗓 01 Aug 2026, 02:44 PM 👁 48
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दुल्हिन बाजार में जरूरी दवाएं हुई 10 से 20% महंगी

पश्चिम एशिया (खाड़ी देशों) में जारी संघर्ष का असर अब भारत के दवा बाजार पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। परिवहन लागत, कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और आयात-निर्यात में आई बाधाओं के कारण आवश्यक दवाओं के दाम बढ़ गए हैं। इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है।

पटना जिले के दुल्हिन बाजार स्थित हेल्थ प्लस दवा दुकान के संचालक फिरोज अख्तर ने बताया कि बीते कुछ समय तमें दवाओं की खरीद लागत में लगातार वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि परिवहन खर्च, माल भाड़ा और दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतें बढ़ने से पेरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स और इंसुलिन जैसी जरूरी दवाएं पहले की तुलना में महंगी हो गई हैं। इससे मरीजों के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं पर भी अतिरिक्त आर्थिक दबाव बढ़ा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य और खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख समुद्री मार्गों पर बढ़ते तनाव के कारण जहाजों तथा हवाई मालवाहक सेवाओं का संचालन प्रभावित हुआ है। इसके परिणामस्वरूप युद्ध जोखिम अधिभार (वार रिस्क सरचार्ज) और माल भाड़े में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। आयातित कच्चे माल की लागत बढ़ने से दवा उद्योग की उत्पादन लागत भी लगातार बढ़ रही है।

दवा निर्माण में उपयोग होने वाले एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट्स (एपीआई), विभिन्न सॉल्वेंट्स तथा पैकेजिंग के लिए जरूरी पेट्रोकेमिकल उत्पादों के दाम में भी तेजी आई है। उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ग्लिसरीन की कीमतों में करीब 64 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि पेरासिटामोल के कच्चे माल की लागत भी काफी बढ़ गई है।

बढ़ती लागत को देखते हुए सरकार और दवा निर्माता कंपनियों ने उत्पादन और आपूर्ति बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए हैं। लागत के दबाव को कम करने के उद्देश्य से कुछ आवश्यक दवाओं की कीमतों में 10 से 20 प्रतिशत तक की अस्थायी वृद्धि की अनुमति दी गई है। हालांकि इसका बोझ अंततः आम उपभोक्ताओं को ही उठाना पड़ रहा है।

दवा कारोबारियों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में आवश्यक दवाओं की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में सरकार और दवा उद्योग के सामने आपूर्ति श्रृंखला को सुचारु बनाए रखने तथा कच्चे माल के वैकल्पिक स्रोत सुनिश्चित करने की बड़ी चुनौती होगी।
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