📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Slyronit
स्वास्थ्य
पटाखों की आवाज़ से सुनने की शक्ति खतरे में: भारत में कानूनी सीमा 125 डेसीबल, 120 डेसीबल बच्चों के लिए जोखिमपूर्ण
✍️ Amar Ujala
🗓 07 नव. 2026, 07:16 AM
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विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि 120 डेसीबल से अधिक की पटाखों की आवाज़ बच्चों की सुनने की क्षमता को नुकसान पहुँचा सकती है; भारत में कानूनी सीमा 125 डेसीबल निर्धारित है।
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने फिर से पुष्टि की है कि पटाखों के लिए अनुमत शोर स्तर 125 डेसीबल है, जिसे स्रोत से 15 मीटर की दूरी पर मापा जाता है। यह सीमा राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य त्योहारी मौसम में अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण को रोकना है।
श्रवण विशेषज्ञों ने कहा है कि 120 डेसीबल से अधिक की आवाज़ बच्चों के अंदरूनी कान के नाज़ुक हेयर सेल्स को अपरिवर्तनीय नुकसान पहुँचा सकती है, जिससे स्थायी सुनने की कमी या टिनिटस हो सकता है। बच्चों की श्रवण प्रणाली वयस्कों की तुलना में अधिक संवेदनशील होती है।
दीपावली के निकट आते ही पटाखों का उपयोग बढ़ता है, इसलिए स्वास्थ्य अधिकारियों ने जनता से कम ध्वनि वाले पटाखों को चुनने और बच्चों के कानों को इयरप्लग या दूरी से बचाने का आग्रह किया है। उल्लंघन करने वाले विक्रेताओं पर जुर्माना लगाने के निर्देश भी जारी किए गए हैं।
कठोर नियमों के बावजूद कई बाजारों में अवैध और उच्च‑ध्वनि वाले पटाखे अभी भी उपलब्ध हैं, जिससे लागू करने की निगरानी को सख्त करने और शोर से जुड़ी दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
श्रवण विशेषज्ञों ने कहा है कि 120 डेसीबल से अधिक की आवाज़ बच्चों के अंदरूनी कान के नाज़ुक हेयर सेल्स को अपरिवर्तनीय नुकसान पहुँचा सकती है, जिससे स्थायी सुनने की कमी या टिनिटस हो सकता है। बच्चों की श्रवण प्रणाली वयस्कों की तुलना में अधिक संवेदनशील होती है।
दीपावली के निकट आते ही पटाखों का उपयोग बढ़ता है, इसलिए स्वास्थ्य अधिकारियों ने जनता से कम ध्वनि वाले पटाखों को चुनने और बच्चों के कानों को इयरप्लग या दूरी से बचाने का आग्रह किया है। उल्लंघन करने वाले विक्रेताओं पर जुर्माना लगाने के निर्देश भी जारी किए गए हैं।
कठोर नियमों के बावजूद कई बाजारों में अवैध और उच्च‑ध्वनि वाले पटाखे अभी भी उपलब्ध हैं, जिससे लागू करने की निगरानी को सख्त करने और शोर से जुड़ी दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिमों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।