📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Ginza Vualzong
राजनीति
मणिपुर में कुकि‑जो और नागा संघर्ष में नई दरारें उभरी
✍️ The Hindu
🗓 18 सित. 2026, 04:01 AM
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विश्लेषकों ने मणिपुर में कुकि‑जो और नागा के पुराने संघर्ष में नई दरारों को उजागर किया, जिससे राज्य की जातीय‑राजनीतिक स्थिति बदल रही है।
मणिपुर में कुकि‑जो और नागा समुदायों के बीच दशकों से चल रहा जातीय संघर्ष अब नई दरारों के साथ उभर रहा है, जैसा कि राजनीतिक विश्लेषकों ने बताया। समुदाय के नेताओं की हालिया बैठकों और स्थानीय गठबंधनों में बदलाव से स्पष्ट है कि विवाद अब केवल पारंपरिक भूमि मुद्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संसाधन वितरण तक विस्तृत हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन नई विभाजनों के उभरने से शांति‑निर्माण प्रयास जटिल हो सकते हैं, जो अब तक मुख्यतः संघर्ष विराम समझौते और सीमित संवाद पर केंद्रित रहे हैं। राज्य प्रशासन को दोनों समूहों के साथ संवाद की रणनीति पुनः मूल्यांकन करनी पड़ रही है, ताकि आगे के तनाव को रोका जा सके।
जबकि भूमि अधिकार और सांस्कृतिक स्वायत्तता के मूल मुद्दे अभी भी प्रासंगिक हैं, इन नई अंतर्सामुदायिक प्रतिस्पर्धाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर इस संघर्ष की धारणा को बदल दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि समावेशी वार्ता के बिना अस्थायी हिंसा की संभावना बढ़ सकती है, जिससे नागरिक जीवन और क्षेत्रीय विकास परियोजनाओं पर असर पड़ेगा।
हिंदुस्तान ने इस नई प्रवृत्ति को उजागर करते हुए नीति निर्माताओं से कुकि‑जो‑नागा संबंधों के बदलते स्वरूप को समझने और ऐतिहासिक शिकायतों के साथ-साथ उभरते विवाद बिंदुओं को भी संबोधित करने का आग्रह किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन नई विभाजनों के उभरने से शांति‑निर्माण प्रयास जटिल हो सकते हैं, जो अब तक मुख्यतः संघर्ष विराम समझौते और सीमित संवाद पर केंद्रित रहे हैं। राज्य प्रशासन को दोनों समूहों के साथ संवाद की रणनीति पुनः मूल्यांकन करनी पड़ रही है, ताकि आगे के तनाव को रोका जा सके।
जबकि भूमि अधिकार और सांस्कृतिक स्वायत्तता के मूल मुद्दे अभी भी प्रासंगिक हैं, इन नई अंतर्सामुदायिक प्रतिस्पर्धाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर इस संघर्ष की धारणा को बदल दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि समावेशी वार्ता के बिना अस्थायी हिंसा की संभावना बढ़ सकती है, जिससे नागरिक जीवन और क्षेत्रीय विकास परियोजनाओं पर असर पड़ेगा।
हिंदुस्तान ने इस नई प्रवृत्ति को उजागर करते हुए नीति निर्माताओं से कुकि‑जो‑नागा संबंधों के बदलते स्वरूप को समझने और ऐतिहासिक शिकायतों के साथ-साथ उभरते विवाद बिंदुओं को भी संबोधित करने का आग्रह किया है।