📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Ms Sarah Welch
धर्म
गया की प्रेतशिला में पिंडदान के बाद श्रद्धालु ठहाका, सत्तू अर्पण से आत्मा को तृप्ति
✍️ Amar Ujala · Bihar
🗓 27 सित. 2026, 07:01 PM
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बिहार के गया में गयाजी की प्रेतशिला वेदी पर श्रद्धालु अकाल मृत्यु वालों के लिए पिंडदान, सत्तू अर्पण और ठहाका लगाते हैं, जिससे आत्माओं की तृप्ति होती है।
गया के बाहरी इलाके में स्थित गयाजी की प्रेतशिला वेदी, एक विशिष्ट मृत्यु‑रिवाज का केंद्र बन गई है जहाँ हर हफ्ते बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यहाँ अकाल या अनैतिक मृत्यु वाले व्यक्तियों के लिए पिंडदान किया जाता है, जिससे उनकी मोक्ष की कामना पूरी हो सके।
समारोह के दौरान श्रद्धालु पिंड को शिलालेख पर रखते हैं और साथ में सत्तू का एक कटोरा अर्पित करते हैं, जिसे आत्माओं के पोषण का प्रतीक माना जाता है। माना जाता है कि यह अर्पण आत्माओं की भूख को शांति प्रदान करता है।
एक अनोखा पहलू है ठहाका – पिंडदान और सत्तू अर्पण के बाद श्रद्धालुओं के बीच उत्पन्न होने वाली हँसी। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस ठहाके की ध्वनि आत्माओं को प्रसन्न करती है और उन्हें पृथ्वी पर रहने से रोकती है।
इसके अलावा, श्रद्धालु शिलालेख पर ब्रह्मा के चरणचिह्नों को पवित्र मानते हैं, जो इस स्थल को दिव्य और पूर्वजों के संगम के रूप में स्थापित करता है। पिंडदान, सत्तू अर्पण, ठहाका और ब्रह्मा के चरणचिह्नों की यह अनूठी परम्परा नियमित भक्तों और जिज्ञासु यात्रियों दोनों को आकर्षित करती है।
समारोह के दौरान श्रद्धालु पिंड को शिलालेख पर रखते हैं और साथ में सत्तू का एक कटोरा अर्पित करते हैं, जिसे आत्माओं के पोषण का प्रतीक माना जाता है। माना जाता है कि यह अर्पण आत्माओं की भूख को शांति प्रदान करता है।
एक अनोखा पहलू है ठहाका – पिंडदान और सत्तू अर्पण के बाद श्रद्धालुओं के बीच उत्पन्न होने वाली हँसी। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस ठहाके की ध्वनि आत्माओं को प्रसन्न करती है और उन्हें पृथ्वी पर रहने से रोकती है।
इसके अलावा, श्रद्धालु शिलालेख पर ब्रह्मा के चरणचिह्नों को पवित्र मानते हैं, जो इस स्थल को दिव्य और पूर्वजों के संगम के रूप में स्थापित करता है। पिंडदान, सत्तू अर्पण, ठहाका और ब्रह्मा के चरणचिह्नों की यह अनूठी परम्परा नियमित भक्तों और जिज्ञासु यात्रियों दोनों को आकर्षित करती है।