📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / skanephoto.com
धर्म
क्रिश्चियन प्रतिनिधिमंडल ने खड़गे से 1% कोटा व कर्नाटक एंटी‑कन्वर्ज़न कानून रद्द करने की माँग की
✍️ Business Today
🗓 17 सित. 2026, 02:37 AM
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क्रिश्चियन नेताओं के एक समूह ने वरिष्ठ मंत्री बसवराज खड़गे से मिलकर कर्नाटक के एंटी‑कन्वर्ज़न कानून को रद्द करने और ईसाइयों के लिए 1% कोटा देने की मांग की।
नई दिल्ली – ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों ने गुरुवार को केंद्रीय मंत्री बसवराज खड़गे से मिलकर अपनी माँगें रखी। प्रतिनिधिमंडल ने सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ईसाइयों के लिए 1% आरक्षण की मांग की, यह तर्क देते हुए कि इस समुदाय का प्रतिनिधित्व अभी भी अपर्याप्त है।
उन्होंने कर्नाटक के एंटी‑कन्वर्ज़न कानून को रद्द करने की भी अपील की, जिसे वे धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और अल्पसंख्यक धर्मों के खिलाफ दुरुपयोग का साधन मानते हैं। उन्होंने ऐसे आँकड़े पेश किए जो इस कानून के ईसाई घरानों पर असमान प्रभाव को दर्शाते हैं।
खड़गे ने इन चिंताओं को स्वीकार किया और कहा कि सरकार आरक्षण प्रस्ताव और राज्य के कानून की वैधता दोनों की समीक्षा करेगी। उन्होंने बताया कि कोई भी निर्णय कैबिनेट की सहमति और संविधानिक प्रावधानों के अनुरूप होना चाहिए।
बैठक में कोई निश्चित समय‑सीमा तय नहीं हुई, पर प्रतिनिधिमंडल ने राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर दबाव बनाये रखने का इरादा जताया। विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आगामी राज्य चुनावों में प्रमुख बन सकता है, जहाँ अल्पसंख्यक वोटों का महत्व बढ़ रहा है।
ईसाई समुदाय की यह मांग, आरक्षण और धार्मिक परिवर्तन संबंधी कानूनों पर चल रही राष्ट्रीय बहस को प्रतिबिंबित करती है, जहाँ कई राज्यों में समान नीतियों की पुनर्समीक्षा हो रही है।
उन्होंने कर्नाटक के एंटी‑कन्वर्ज़न कानून को रद्द करने की भी अपील की, जिसे वे धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और अल्पसंख्यक धर्मों के खिलाफ दुरुपयोग का साधन मानते हैं। उन्होंने ऐसे आँकड़े पेश किए जो इस कानून के ईसाई घरानों पर असमान प्रभाव को दर्शाते हैं।
खड़गे ने इन चिंताओं को स्वीकार किया और कहा कि सरकार आरक्षण प्रस्ताव और राज्य के कानून की वैधता दोनों की समीक्षा करेगी। उन्होंने बताया कि कोई भी निर्णय कैबिनेट की सहमति और संविधानिक प्रावधानों के अनुरूप होना चाहिए।
बैठक में कोई निश्चित समय‑सीमा तय नहीं हुई, पर प्रतिनिधिमंडल ने राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर दबाव बनाये रखने का इरादा जताया। विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आगामी राज्य चुनावों में प्रमुख बन सकता है, जहाँ अल्पसंख्यक वोटों का महत्व बढ़ रहा है।
ईसाई समुदाय की यह मांग, आरक्षण और धार्मिक परिवर्तन संबंधी कानूनों पर चल रही राष्ट्रीय बहस को प्रतिबिंबित करती है, जहाँ कई राज्यों में समान नीतियों की पुनर्समीक्षा हो रही है।