📷 चित्र स्रोत: The Hindu (via NewsData)
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बंचहाड़ा महिलाओं का जन्म में जश्न, सेक्स वर्क में मजबूर
✍️ The Hindu
🗓 01 अग. 2026, 08:38 AM
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मध्यप्रदेश में बंचहाड़ा समुदाय ने जन्म के समय बेटियों पर अधिक खर्च किया, पर बाद में उन्हें सेक्स वर्क में धकेलने की परंपरा है। यह प्रथा ब्रिटिश काल के ‘अपराधी जनजाति’ के लेबल से जुड़ी है।
मध्यप्रदेश की बंचहाड़ा समुदाय, जो कि शेड्यूल्ड कैस्ट्रे के अंतर्गत आती है, ने बेटियों के जन्म पर बड़े उत्सव मनाने की परंपरा रखी है। परिवार अक्सर बेटियों को बेहतर पोषण और कपड़े देकर भविष्य की तैयारी करते हैं।
परंतु वही संसाधन बाद में बेटियों को सेक्स वर्क में धकेलने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, जिससे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सरकारी अधिकारियों ने इस प्रथा पर कड़ी आलोचना की है। यह दमन का चक्र ब्रिटिश काल में बंचहाड़ा को ‘अपराधी जनजाति’ के रूप में चिह्नित करने के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा माना जाता है।
हाल के वर्षों में राज्य सरकार और गैर‑सरकारी संगठनों ने इस चक्र को तोड़ने के लिए हस्तक्षेप शुरू किए हैं। इन पहलों में व्यावसायिक प्रशिक्षण, शैक्षिक छात्रवृत्ति और पीड़ितों के लिए कानूनी सहायता शामिल है। फिर भी प्रगति धीमी है, क्योंकि गहरी जड़ें जमा सामाजिक दृष्टिकोण और आर्थिक दबाव परिवर्तन को रोकते हैं।
बंचहाड़ा की समस्या भारत के कई हाशिये पर रहने वाले समुदायों द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों को उजागर करती है, जहाँ पारंपरिक प्रथाएँ और प्रणालीगत भेदभाव गरीबी और शोषण के चक्र को जारी रखती हैं।
परंतु वही संसाधन बाद में बेटियों को सेक्स वर्क में धकेलने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, जिससे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सरकारी अधिकारियों ने इस प्रथा पर कड़ी आलोचना की है। यह दमन का चक्र ब्रिटिश काल में बंचहाड़ा को ‘अपराधी जनजाति’ के रूप में चिह्नित करने के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा माना जाता है।
हाल के वर्षों में राज्य सरकार और गैर‑सरकारी संगठनों ने इस चक्र को तोड़ने के लिए हस्तक्षेप शुरू किए हैं। इन पहलों में व्यावसायिक प्रशिक्षण, शैक्षिक छात्रवृत्ति और पीड़ितों के लिए कानूनी सहायता शामिल है। फिर भी प्रगति धीमी है, क्योंकि गहरी जड़ें जमा सामाजिक दृष्टिकोण और आर्थिक दबाव परिवर्तन को रोकते हैं।
बंचहाड़ा की समस्या भारत के कई हाशिये पर रहने वाले समुदायों द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों को उजागर करती है, जहाँ पारंपरिक प्रथाएँ और प्रणालीगत भेदभाव गरीबी और शोषण के चक्र को जारी रखती हैं।