📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Itsmalay~commonswiki
धर्म
सागर में 1700 साल पुराना शिलापट्ट मिला, तीन दृश्यों में दिखा बलराम का जन्म
✍️ Amar Ujala · Sagar
🗓 03 सित. 2026, 01:02 PM
👁 27
सागर जिले में पुरातत्वविदों ने 5वीं‑6वीं शताब्दी का दुर्लभ शिलापट्ट पाया, जिसमें तीन दृश्यों में भगवान बलराम के जन्म की कथा उकेरी गई है।
मध्य प्रदेश के सागर जिले के एरण पुरास्थल पर पुरातत्वविदों ने 5वीं‑6वीं शताब्दी ईस्वी का, लगभग 1,700 साल पुराना शिलापट्ट खोजा है। यह शिलापट्ट एक ही पत्थर के ब्लॉक से तराशा गया है और गुप्तकालीन बस्ती की व्यवस्थित खुदाई के दौरान मिला।
शिलापट्ट पर तीन दृश्यों में भगवान बलराम के जन्म की पौराणिक कथा को उकेरा गया है। पहला दृश्य दिव्य गर्भ‑प्रत्यारोपण को दर्शाता है, दूसरा चमत्कारिक जन्म को, और तीसरा शिशु बलराम को उसके प्रसिद्ध हल और गदा के साथ दिखाता है, जो उनके बाद के चरित्र से जुड़े प्रतीक हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह गुप्तकालीन समय में धार्मिक कथाओं के दृश्य अभिलेख प्रदान करती है, जब अधिकांश जानकारी लिखित स्रोतों से आती थी। नक्काशी की शैली गुप्तकालीन कला के मानकों से मेल खाती है, जो उच्च स्तर की शिल्पकला को दर्शाती है।
शिलापट्ट को भोपाल के राज्य संग्रहालय में संरक्षित किया जाएगा और आगे के अध्ययन के लिए इसे वैज्ञानिकों को उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे उस युग में हिंदू देवताओं की चित्रात्मक प्रस्तुति के क्षेत्रीय विविधताओं को समझा जा सके।
शिलापट्ट पर तीन दृश्यों में भगवान बलराम के जन्म की पौराणिक कथा को उकेरा गया है। पहला दृश्य दिव्य गर्भ‑प्रत्यारोपण को दर्शाता है, दूसरा चमत्कारिक जन्म को, और तीसरा शिशु बलराम को उसके प्रसिद्ध हल और गदा के साथ दिखाता है, जो उनके बाद के चरित्र से जुड़े प्रतीक हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह गुप्तकालीन समय में धार्मिक कथाओं के दृश्य अभिलेख प्रदान करती है, जब अधिकांश जानकारी लिखित स्रोतों से आती थी। नक्काशी की शैली गुप्तकालीन कला के मानकों से मेल खाती है, जो उच्च स्तर की शिल्पकला को दर्शाती है।
शिलापट्ट को भोपाल के राज्य संग्रहालय में संरक्षित किया जाएगा और आगे के अध्ययन के लिए इसे वैज्ञानिकों को उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे उस युग में हिंदू देवताओं की चित्रात्मक प्रस्तुति के क्षेत्रीय विविधताओं को समझा जा सके।