📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Itsmalay~commonswiki
धर्म
सागर के एरण पुरास्थल से मिला 1700 साल पुराना शिलापट्ट, दिखाता है भगवान बलराम की गर्भ‑प्रत्यारोपण कथा
✍️ Amar Ujala · Sagar
🗓 03 सित. 2026, 01:17 PM
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सागर, मध्य प्रदेश के एरण पुरास्थल में मिली 5वीं‑6वीं शताब्दी की दुर्लभ शिलापट्ट में भगवान बलराम के जन्म और गर्भ‑प्रत्यारोपण की पौराणिक कथा दर्शायी गई है, जो इस कथा का पहला चित्रात्मक प्रमाण है।
सागर, मध्य प्रदेश के एरण पुरास्थल में काम कर रहे पुरातत्वविदों ने 5वीं‑6वीं शताब्दी ईस्वी का एक शिलापट्ट खोजा है। इस पत्थर पर उकेरी गई कलाकृति में भगवान बलराम के जन्म और ‘गर्भ‑प्रत्यारोपण’ की पौराणिक कथा को दर्शाया गया है, जिसे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित एक विशेष अनुष्ठान माना जाता है।
पत्थर की सतह की परत और साथ मिले मिट्टी के बर्तनों की वैज्ञानिक जाँच से इसका आयु लगभग 1,700 वर्ष निर्धारित हुई है, जो इसे गुप्तकालीन (गुप्तकाल) सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ती है। इस चित्र में बलराम को एक स्थिर देवता के बजाय कथा के क्रम में दिखाया गया है, जो पूर्व की प्रतिमाओं से अलग है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज उस कथा का पहला चित्रात्मक प्रमाण है, जो अब तक केवल लिखित स्रोतों में ही मिलती थी। यह प्राचीन भारतीय धार्मिक कला और मिथक के प्रसार के अध्ययन में नया आयाम जोड़ती है और समान काल के अन्य स्थल पर समान प्रतीकों की खोज को प्रेरित कर सकती है।
शिलापट्ट को राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया जा रहा है और आगे के अध्ययन के बाद इसे क्षेत्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित करने की योजना है।
पत्थर की सतह की परत और साथ मिले मिट्टी के बर्तनों की वैज्ञानिक जाँच से इसका आयु लगभग 1,700 वर्ष निर्धारित हुई है, जो इसे गुप्तकालीन (गुप्तकाल) सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ती है। इस चित्र में बलराम को एक स्थिर देवता के बजाय कथा के क्रम में दिखाया गया है, जो पूर्व की प्रतिमाओं से अलग है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज उस कथा का पहला चित्रात्मक प्रमाण है, जो अब तक केवल लिखित स्रोतों में ही मिलती थी। यह प्राचीन भारतीय धार्मिक कला और मिथक के प्रसार के अध्ययन में नया आयाम जोड़ती है और समान काल के अन्य स्थल पर समान प्रतीकों की खोज को प्रेरित कर सकती है।
शिलापट्ट को राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया जा रहा है और आगे के अध्ययन के बाद इसे क्षेत्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित करने की योजना है।