📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / © Pierre André
यात्रा
उत्तarakhand ने 1962 के बाद 64 साल बाद चीन सीमा के परित्यक्त गांवों को पर्यटन स्थल बना दिया
✍️ News18
🗓 10 सित. 2026, 03:18 PM
👁 10
राज्य सरकार ने चीन सीमा के निकट परित्यक्त गांवों को पर्यटन केंद्र बनाने की योजना की घोषणा की है, जो 1962 के युद्ध के बाद खाली हुए थे। बुनियादी ढाँचा और प्रचार से पर्यटकों को आकर्षित करने की कोशिश की जाएगी।
उत्तarakhand सरकार ने चीन सीमा के निकट स्थित परित्यक्त गांवों को नियोजित पर्यटन स्थलों में बदलने की नई पहल की घोषणा की है। 1962 के भारत‑चीन युद्ध के बाद खाली हुए इन बस्तियों को छह दशकों से अधिक समय तक कोई निवासी नहीं मिला।
योजना के तहत बुनियादी सुविधाएँ जैसे सड़क पहुँच, संकेत बोर्ड और पर्यावरण‑अनुकूल आवास स्थापित किए जाएंगे, साथ ही सीमा के संवेदनशील माहौल को सुरक्षित रखा जाएगा। अधिकारियों ने कहा कि इस कदम से स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन, रोजगार सृजन और क्षेत्र की प्राकृतिक‑सांस्कृतिक धरोहर को उजागर करने में मदद मिलेगी।
पर्यटन विभाग ने बताया कि विकास कार्य रक्षा विभाग के साथ समन्वय में होगा ताकि सुरक्षा प्रोटोकॉल बरकरार रहें। प्रारंभिक चरण में कुछ चुनिंदा गांवों को मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा, जिसके बाद सफलताप्राप्ति के आधार पर अन्य सीमा बस्तियों में भी विस्तार किया जा सकता है।
स्थानीय समुदाय और heritage विशेषज्ञों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है, ताकि संरक्षण और पर्यटक प्रवाह के बीच संतुलन बना रहे। यह पहल भारत की सीमा‑क्षेत्र नीतियों में रणनीतिक हितों के साथ सतत विकास को जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
योजना के तहत बुनियादी सुविधाएँ जैसे सड़क पहुँच, संकेत बोर्ड और पर्यावरण‑अनुकूल आवास स्थापित किए जाएंगे, साथ ही सीमा के संवेदनशील माहौल को सुरक्षित रखा जाएगा। अधिकारियों ने कहा कि इस कदम से स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन, रोजगार सृजन और क्षेत्र की प्राकृतिक‑सांस्कृतिक धरोहर को उजागर करने में मदद मिलेगी।
पर्यटन विभाग ने बताया कि विकास कार्य रक्षा विभाग के साथ समन्वय में होगा ताकि सुरक्षा प्रोटोकॉल बरकरार रहें। प्रारंभिक चरण में कुछ चुनिंदा गांवों को मॉडल के रूप में विकसित किया जाएगा, जिसके बाद सफलताप्राप्ति के आधार पर अन्य सीमा बस्तियों में भी विस्तार किया जा सकता है।
स्थानीय समुदाय और heritage विशेषज्ञों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है, ताकि संरक्षण और पर्यटक प्रवाह के बीच संतुलन बना रहे। यह पहल भारत की सीमा‑क्षेत्र नीतियों में रणनीतिक हितों के साथ सतत विकास को जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।