📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / United States Department of the Treasury
बिज़नेस
अमेरिका ने रूसी तेल पर 100% तक टैरिफ लगाए, भारत‑चीन को खतरा
✍️ India Today
🗓 20 सित. 2026, 07:31 AM
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संयुक्त राज्य ने रूसी कच्चे तेल पर 100% तक टैरिफ लगाने का कानून पेश किया, जिससे भारत और चीन जैसे प्रमुख खरीदारों को सीधा असर पड़ेगा।
वाशिंगटन ने एक नया प्रतिबंध ढांचा पेश किया है, जिससे रूस से निर्यात किए जाने वाले तेल पर 100% तक टैरिफ लगाना संभव हो गया है। यह कदम मॉस्को की आय को घटाने और एशिया के प्रमुख खरीदारों पर दबाव बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
घोषणा के अनुसार, भारत और चीन – जो रूसी कच्चे तेल के दो सबसे बड़े एशियाई आयातक हैं – को भविष्य में इस टैरिफ का पूरा भार उठाना पड़ सकता है। यह कार्रवाई यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद पश्चिमी देशों द्वारा ऊर्जा क्षेत्र को निशाना बनाने वाली कई पहलों के बाद की गई है।
भारतीय अधिकारियों ने बताया कि संभावित टैरिफ से देश की तेल आयात नीति में बदलाव आ सकता है, जिससे वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश तेज होगी। वहीं, चीन भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा योजना पर इस प्रभाव का मूल्यांकन कर रहा है।
संयुक्त राज्य ने चेतावनी दी है कि कानून के लागू होते ही टैरिफ व्यवस्था तुरंत लागू की जाएगी, जिससे चल रहे भू‑राजनीतिक तनाव में और कड़ा रुख दिखता है।
विश्लेषकों का मानना है कि टैरिफ का मुख्य लक्ष्य रूसी आय को कम करना है, परन्तु इससे वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि और प्रभावित एशियाई देशों के साथ व्यापार संबंधों में तनाव भी उत्पन्न हो सकता है।
घोषणा के अनुसार, भारत और चीन – जो रूसी कच्चे तेल के दो सबसे बड़े एशियाई आयातक हैं – को भविष्य में इस टैरिफ का पूरा भार उठाना पड़ सकता है। यह कार्रवाई यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद पश्चिमी देशों द्वारा ऊर्जा क्षेत्र को निशाना बनाने वाली कई पहलों के बाद की गई है।
भारतीय अधिकारियों ने बताया कि संभावित टैरिफ से देश की तेल आयात नीति में बदलाव आ सकता है, जिससे वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश तेज होगी। वहीं, चीन भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा योजना पर इस प्रभाव का मूल्यांकन कर रहा है।
संयुक्त राज्य ने चेतावनी दी है कि कानून के लागू होते ही टैरिफ व्यवस्था तुरंत लागू की जाएगी, जिससे चल रहे भू‑राजनीतिक तनाव में और कड़ा रुख दिखता है।
विश्लेषकों का मानना है कि टैरिफ का मुख्य लक्ष्य रूसी आय को कम करना है, परन्तु इससे वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि और प्रभावित एशियाई देशों के साथ व्यापार संबंधों में तनाव भी उत्पन्न हो सकता है।