📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Alexandre Ultré
विदेश
यूके ने बोपल व्यापारी के 109 साल पुराने ₹35,000 वार बांड दावे का कोई रिकॉर्ड नहीं पाया
✍️ Livemint
🗓 20 अक्टू. 2026, 12:37 AM
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यूनाइटेड किंगडम ने कहा कि बोपल व्यापारी द्वारा ₹35,000 में खरीदे गए 109 साल पुराने ब्रिटिश वार बांड का कोई रिकॉर्ड उनके पास नहीं है, यह दावा व्यापारी के सांसद परिवार ने किया है।
लंदन के अधिकारियों ने यह बताया कि बोपल के एक व्यापारी ने 1915 में लगभग ₹35,000 के बराबर ब्रिटिश वार बांड खरीदा था, इस दावे को लेकर परिवार ने आधिकारिक पुष्टि की मांग की थी। व्यापारी के परिवार में सांसद भी शामिल है। यूके सरकार ने कहा कि अपने अभिलेखों की जाँच के बाद ऐसे किसी बांड का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला है।
परिवार ने तर्क दिया था कि एक सदी से अधिक पुराना बांड अभी भी आधिकारिक दस्तावेज़ों में मिलना चाहिए। ब्रिटिश अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जारी किए गए वार बांडों को युद्ध के बाद अधिकांशतः रिडीम या रद्द कर दिया गया, और बचे हुए रिकॉर्ड ऐतिहासिक अभिलेखों में होते हैं, जिनमें बोपल के निवेशक का उल्लेख नहीं है।
Livemint ने इस विकास की रिपोर्ट की, यह बताते हुए कि यूके की अस्वीकृति के बाद परिवार के पास इस निवेश का कोई दस्तावेज़ी प्रमाण नहीं बचा। यह मामला उन वित्तीय साधनों की सत्यता जांचने की कठिनाइयों को उजागर करता है, जो सौ साल से अधिक पुरानी हों और जिनके रिकॉर्ड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हों।
एमपी या व्यापारी के वंशजों ने अभी तक कोई अतिरिक्त टिप्पणी नहीं की है और न ही कोई कानूनी कदम उठाने की सूचना दी गई है। यह कहानी भारतीय उद्यमियों द्वारा उपनिवेशकाल में किए गए विदेशी निवेशों के इतिहास को समझने में रुचि रखने वालों के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है।
परिवार ने तर्क दिया था कि एक सदी से अधिक पुराना बांड अभी भी आधिकारिक दस्तावेज़ों में मिलना चाहिए। ब्रिटिश अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जारी किए गए वार बांडों को युद्ध के बाद अधिकांशतः रिडीम या रद्द कर दिया गया, और बचे हुए रिकॉर्ड ऐतिहासिक अभिलेखों में होते हैं, जिनमें बोपल के निवेशक का उल्लेख नहीं है।
Livemint ने इस विकास की रिपोर्ट की, यह बताते हुए कि यूके की अस्वीकृति के बाद परिवार के पास इस निवेश का कोई दस्तावेज़ी प्रमाण नहीं बचा। यह मामला उन वित्तीय साधनों की सत्यता जांचने की कठिनाइयों को उजागर करता है, जो सौ साल से अधिक पुरानी हों और जिनके रिकॉर्ड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हों।
एमपी या व्यापारी के वंशजों ने अभी तक कोई अतिरिक्त टिप्पणी नहीं की है और न ही कोई कानूनी कदम उठाने की सूचना दी गई है। यह कहानी भारतीय उद्यमियों द्वारा उपनिवेशकाल में किए गए विदेशी निवेशों के इतिहास को समझने में रुचि रखने वालों के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है।