📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / AnonymousUnknown author
अपराध
थाने कोर्ट ने नाबालिग पर बार-बार दुष्कर्म के लिए 20 साल की सजा सुनाई, सहमति को निरर्थक कहा
✍️ Amar Ujala · Maharashtra
🗓 29 अग. 2026, 11:02 PM
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थाने कोर्ट ने नाबालिग पर बार-बार दुष्कर्म करने वाले आरोपी को 20 साल की जेल की सजा दी, यह कहा कि पीड़िता की सहमति का कोई महत्व नहीं।
थाने सत्र न्यायालय ने नाबालिग पर बार-बार दुष्कर्म करने वाले आरोपी को 20 साल की कठोर जेल की सजा सुनाई। यह फैसला छह साल बाद दिया गया, जिसमें न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि नाबालिग की सहमति कानूनी तौर पर कोई महत्व नहीं रखती।
न्यायालय ने कहा कि अपराधों की दोहराव प्रकृति स्पष्ट रूप से पीड़िता का शोषण दर्शाती है, इसलिए कड़ी सजा अनिवार्य है। जज ने यह दोहराया कि बाल यौन शोषण (POCSO) अधिनियम के तहत नाबालिग की सहमति को पूरी तरह से बाहर रखा गया है।
कानूनी विशेषज्ञों ने बताया कि यह निर्णय बच्चों की सुरक्षा के प्रति न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है और भविष्य में ऐसे अपराधों को रोकने में deterrent का काम करेगा। यह सजा महाराष्ट्र में बाल यौन अपराधों की तेज़ और कड़ी कार्यवाही के प्रयासों के साथ मेल खाती है।
दोषी की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई, लेकिन उसे अपील दर्ज करने की संभावना के साथ हिरासत में रखा गया है। पीड़िता के परिवार ने न्यायालय के कठोर रुख पर राहत व्यक्त की, जबकि बाल संरक्षण संगठनों ने इस निर्णय का स्वागत किया।
यह मामला नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों की जटिलताओं को उजागर करता है, जिससे जागरूकता बढ़ाने, मुकदमों की गति तेज करने और मौजूदा कानूनों के कड़ाई से पालन की मांग बढ़ रही है।
न्यायालय ने कहा कि अपराधों की दोहराव प्रकृति स्पष्ट रूप से पीड़िता का शोषण दर्शाती है, इसलिए कड़ी सजा अनिवार्य है। जज ने यह दोहराया कि बाल यौन शोषण (POCSO) अधिनियम के तहत नाबालिग की सहमति को पूरी तरह से बाहर रखा गया है।
कानूनी विशेषज्ञों ने बताया कि यह निर्णय बच्चों की सुरक्षा के प्रति न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है और भविष्य में ऐसे अपराधों को रोकने में deterrent का काम करेगा। यह सजा महाराष्ट्र में बाल यौन अपराधों की तेज़ और कड़ी कार्यवाही के प्रयासों के साथ मेल खाती है।
दोषी की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई, लेकिन उसे अपील दर्ज करने की संभावना के साथ हिरासत में रखा गया है। पीड़िता के परिवार ने न्यायालय के कठोर रुख पर राहत व्यक्त की, जबकि बाल संरक्षण संगठनों ने इस निर्णय का स्वागत किया।
यह मामला नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों की जटिलताओं को उजागर करता है, जिससे जागरूकता बढ़ाने, मुकदमों की गति तेज करने और मौजूदा कानूनों के कड़ाई से पालन की मांग बढ़ रही है।