📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / John Rostron
कृषि
पंजाब के मालवा में फसल अवशेष जलाने से 440 नई आगें लगीं
✍️ Hindustan Times
🗓 06 नव. 2026, 08:32 AM
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पंजाब के मालवा क्षेत्र में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं में तेज़ी आई, 440 नई आगें दर्ज हुईं, जिससे राज्य में वायु गुणवत्ता पर दबाव बढ़ा।
पंजाब के मालवा कृषि क्षेत्र में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं में तेज़ी आई है, जहाँ अधिकारियों ने 440 नई आगों की पुष्टि की है। गेहूँ‑चावल की कटाई के बाद जलाए गए अवशेष कई गाँवों में फैल गए, जिससे स्थानीय प्रशासन ने फायर‑ब्रिगेड को तैनात किया और राज्य आपदा प्रबंधन इकाई से मदद मांगी।
नज़दीकी जिलों के वायु गुणवत्ता मॉनिटरिंग स्टेशन ने कण पदार्थ (PM) में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की, जिससे स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियां जारी की गईं। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने विशेष रूप से श्वसन रोगियों को बाहर की गतिविधियों को सीमित करने की सलाह दी है।
इस क्षेत्र के किसान किफायती अवशेष प्रबंधन विकल्पों की कमी को जलाने के प्रमुख कारण के रूप में बताते हैं। पंजाब सरकार ने सस्ती ‘हैप्पी सीडर’ जैसी मशीनरी प्रदान करने और मौजूदा अवशेष संग्रह योजना का विस्तार करने का वचन दोहराया है, ताकि पोस्ट‑हार्वेस्ट अवधि में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
पर्यावरणीय NGOs ने मौजूदा खुले जलाने पर प्रतिबंधों के कड़ाई से पालन और किसानों को जागरूक करने के लिए व्यापक अभियान की मांग की है। राष्ट्रीय हरित न्यायालय भी स्थिति की निगरानी कर रहा है, और यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो दोहराव वाले उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की संभावना है।
फसल अवशेष जलाने में वृद्धि उत्तर भारत में वायु प्रदूषण प्रबंधन की व्यापक चुनौती को और बढ़ा रही है, जहाँ मौसमी जलाने से प्रमुख शहरों में सर्दियों की धुंध में महत्वपूर्ण योगदान मिलता है।
नज़दीकी जिलों के वायु गुणवत्ता मॉनिटरिंग स्टेशन ने कण पदार्थ (PM) में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की, जिससे स्वास्थ्य संबंधी चेतावनियां जारी की गईं। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने विशेष रूप से श्वसन रोगियों को बाहर की गतिविधियों को सीमित करने की सलाह दी है।
इस क्षेत्र के किसान किफायती अवशेष प्रबंधन विकल्पों की कमी को जलाने के प्रमुख कारण के रूप में बताते हैं। पंजाब सरकार ने सस्ती ‘हैप्पी सीडर’ जैसी मशीनरी प्रदान करने और मौजूदा अवशेष संग्रह योजना का विस्तार करने का वचन दोहराया है, ताकि पोस्ट‑हार्वेस्ट अवधि में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
पर्यावरणीय NGOs ने मौजूदा खुले जलाने पर प्रतिबंधों के कड़ाई से पालन और किसानों को जागरूक करने के लिए व्यापक अभियान की मांग की है। राष्ट्रीय हरित न्यायालय भी स्थिति की निगरानी कर रहा है, और यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो दोहराव वाले उल्लंघनकर्ताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की संभावना है।
फसल अवशेष जलाने में वृद्धि उत्तर भारत में वायु प्रदूषण प्रबंधन की व्यापक चुनौती को और बढ़ा रही है, जहाँ मौसमी जलाने से प्रमुख शहरों में सर्दियों की धुंध में महत्वपूर्ण योगदान मिलता है।