📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Rehman Abubakr
कृषि
सीहोर में किसान दूध की नदी बहाते हैं, पशु‑आशीर्वाद की सदियों पुरानी परम्परा जीवित
✍️ Amar Ujala · Madhya Pradesh
🗓 08 नव. 2026, 03:33 PM
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मध्य प्रदेश के सीहोर में किसान पशुओं की खुशहाली के लिये नदी में दूध बहाने की सदियों पुरानी परम्परा को आज भी निभा रहे हैं।
मध्य प्रदेश के सीहोर में किसान एक अनोखी परम्परा निभाते हैं, जिसमें वे अपने पशुओं की खुशहाली के लिये नजदीकी नदी में दूध बहाते हैं। यह रीति-रिवाज पीढ़ियों से चला आ रहा है और माना जाता है कि इससे पशुओं को ईश्वरीय आशीर्वाद मिलते हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह अनुष्ठान विशेष शुभ दिनों की सुबह किया जाता है, जबकि भागीदार पारम्परिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए दूध का अर्पण करते हैं। नदी को समुदाय द्वारा पवित्र मानते हुए, माना जाता है कि वह इस अर्पण को देवताओं तक पहुंचा देती है, जिससे पशु स्वस्थ और रोग‑मुक्त रहें।
हालांकि इस रीति को कोई सरकारी मान्यता नहीं है, पर यह क्षेत्र की कृषि संस्कृति और पशुपालन के प्रति श्रद्धा का जीवंत प्रमाण है। अधिकारियों ने कहा है कि दूध की मात्रा सीमित होने के कारण पर्यावरणीय प्रभाव न्यूनतम है।
यह परम्परा ग्रामीण भारत में कृषि और आध्यात्मिकता के गहरे संबंध को दर्शाती है, जहाँ किसान व्यावहारिक पशु देखभाल को प्राचीन विश्वासों के साथ जोड़ते हैं।
जवानी किसानों में भी इस रीति का चलन बढ़ रहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पशु‑कल्याण से जुड़ी यह श्रद्धा आधुनिक कृषि प्रगति के बावजूद जीवित है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह अनुष्ठान विशेष शुभ दिनों की सुबह किया जाता है, जबकि भागीदार पारम्परिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए दूध का अर्पण करते हैं। नदी को समुदाय द्वारा पवित्र मानते हुए, माना जाता है कि वह इस अर्पण को देवताओं तक पहुंचा देती है, जिससे पशु स्वस्थ और रोग‑मुक्त रहें।
हालांकि इस रीति को कोई सरकारी मान्यता नहीं है, पर यह क्षेत्र की कृषि संस्कृति और पशुपालन के प्रति श्रद्धा का जीवंत प्रमाण है। अधिकारियों ने कहा है कि दूध की मात्रा सीमित होने के कारण पर्यावरणीय प्रभाव न्यूनतम है।
यह परम्परा ग्रामीण भारत में कृषि और आध्यात्मिकता के गहरे संबंध को दर्शाती है, जहाँ किसान व्यावहारिक पशु देखभाल को प्राचीन विश्वासों के साथ जोड़ते हैं।
जवानी किसानों में भी इस रीति का चलन बढ़ रहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पशु‑कल्याण से जुड़ी यह श्रद्धा आधुनिक कृषि प्रगति के बावजूद जीवित है।