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13 अक्टू. 2026•
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शिक्षा

सम्राट योद्धा फाउंडेशन के संस्थापक शिवम मौर्य जी लखनऊ से देश के लोगों के सामने अपनी कुछ बातें रखी हैं।

✍️ रिपोर्टर: Kuldeep 🗓 13 अक्टू. 2026, 12:14 AM 👁 20
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सम्राट योद्धा फाउंडेशन के संस्थापक शिवम् मौर्या ने कहा है कि समाज के वास्तविक विकास के लिए शिक्षा, जागरूकता और युवाओं की भागीदारी सबसे मजबूत नींव है। उन्होंने जोर दिया कि केवल आवाज़ उठाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अधिकारों और संविधान की समझ संघर्ष को सही दिशा देती है।

देश में सकारात्मक परिवर्तन लाने के अपने दृष्टिकोण को साझा करते हुए कहा कि किसी भी समाज के वास्तविक विकास और स्थायी परिवर्तन की सबसे मजबूत नींव शिक्षा, जागरूकता, संवैधानिक अधिकारों की समझ और युवाओं की भागीदारी है। मौर्या जी ने इस बात पर जोर दिया कि केवल आवाज़ उठाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने अधिकारों, संविधान और कानून को समझना संघर्ष को सही दिशा देता है।
उन्होंने कहा कि बच्चों को समाज के लिए आवाज़ उठाने से पहले ज्ञान, तर्क और समझ के साथ अपनी बात रखने में सक्षम बनाना आवश्यक है। यदि समाज के बच्चे योग्य अधिकारी बन सकते हैं, तो उन्हें हर समस्या के समाधान के लिए अधिकारियों के दरवाजे पर खड़ा नहीं होना पड़ेगा। लोगों को यह प्रयास करना चाहिए कि उनके बच्चे योग्य बनकर व्यवस्था में अपनी मजबूत भागीदारी सुनिश्चित करें और समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।
मौर्या जी ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि कई बार समस्या अधिकारों की कमी से नहीं, बल्कि जानकारी की कमी से होती है। संविधान और कानून द्वारा प्रदत्त अधिकारों को समझना और उनका सही उपयोग करना महत्वपूर्ण है। एक जागरूक नागरिक ही अपने अधिकारों की रक्षा करते हुए दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना सीखता है। उनके अनुसार, एक दिन का आंदोलन तत्काल आवाज़ उठा सकता है, लेकिन शिक्षा पीढ़ियों का भविष्य बदल सकती है।
सम्राट योद्धा फाउंडेशन का संदेश स्पष्ट है: पहले शिक्षा, फिर जागरूकता, संवैधानिक अधिकारों की समझ, योग्यता, और फिर संगठन व सामाजिक एकता। अंततः, ऐसा सकारात्मक परिवर्तन लाना है जिसे आने वाली पीढ़ियाँ महसूस करें। मौर्या जी ने कहा कि सड़क पर उतरने वाली आवाज़ कुछ समय तक सुनी जाती है, लेकिन शिक्षित होकर व्यवस्था में पहुँचने वाली आवाज़ फैसले बदल सकती है। उन्होंने सभी से मिलकर एक ऐसे समाज के निर्माण का प्रयास करने का आह्वान किया जहाँ बच्चों की पहचान उनके संघर्ष से नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा, योग्यता, ज्ञान और उपलब्धियों से हो। हुई
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