📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Ingo Mehling
शिक्षा
कर्नाटक में तीसरी भाषा को एआई से बदलने की योजना पर निजी स्कूल संघ ने जताया विरोध
✍️ Mangalore Today
🗓 29 अग. 2026, 12:03 PM
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कर्नाटक सरकार की तीसरी अनिवार्य भाषा को एआई विषय से बदलने की योजना पर राज्य के निजी स्कूल संघ ने विरोध जताया है।
कर्नाटक सरकार ने एक मसौदा नीति प्रस्तुत की है, जिसमें स्कूलों में अनिवार्य तीसरी भाषा को हटाकर कृत्रिम‑बुद्धिमत्ता (एआई) के अध्ययन को अनिवार्य किया जाएगा। इस योजना के तहत कक्षा छह से दस तक के छात्रों को पारंपरिक भाषा विकल्पों के बजाय एआई की बुनियादी अवधारणाएँ पढ़ाई जाएँगी।
राज्य के निजी स्कूल संघ, जो 1,200 से अधिक संस्थानों का प्रतिनिधित्व करता है, ने इस कदम की कड़ी निंदा की है। संघ ने कहा कि भाषा दक्षता सांस्कृतिक पहचान और प्रतिस्पर्धात्मक लाभ का मूलभूत स्तम्भ है, और एआई पर अचानक बदलाव से मौजूदा शिक्षण ढाँचे में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
संघ ने बताया कि वह इस नीति को संशोधित करने के लिए कानूनी उपायों पर विचार करेगा और शिक्षा विभाग के साथ संवाद स्थापित करेगा। उन्होंने सभी हितधारकों की व्यापक सलाह-मशविरा करने की भी मांग की है।
शिक्षा अधिकारियों का कहना है कि एआई को प्रारम्भिक स्तर पर शामिल करना छात्रों को डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिये आवश्यक कौशल प्रदान करेगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह प्रस्ताव अभी परामर्श चरण में है और प्रतिक्रिया के आधार पर संशोधित किया जा सकता है।
यह विवाद भारत के शिक्षा क्षेत्र में भाषा संरक्षण और तकनीकी उन्नति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को उजागर करता है।
राज्य के निजी स्कूल संघ, जो 1,200 से अधिक संस्थानों का प्रतिनिधित्व करता है, ने इस कदम की कड़ी निंदा की है। संघ ने कहा कि भाषा दक्षता सांस्कृतिक पहचान और प्रतिस्पर्धात्मक लाभ का मूलभूत स्तम्भ है, और एआई पर अचानक बदलाव से मौजूदा शिक्षण ढाँचे में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
संघ ने बताया कि वह इस नीति को संशोधित करने के लिए कानूनी उपायों पर विचार करेगा और शिक्षा विभाग के साथ संवाद स्थापित करेगा। उन्होंने सभी हितधारकों की व्यापक सलाह-मशविरा करने की भी मांग की है।
शिक्षा अधिकारियों का कहना है कि एआई को प्रारम्भिक स्तर पर शामिल करना छात्रों को डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिये आवश्यक कौशल प्रदान करेगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह प्रस्ताव अभी परामर्श चरण में है और प्रतिक्रिया के आधार पर संशोधित किया जा सकता है।
यह विवाद भारत के शिक्षा क्षेत्र में भाषा संरक्षण और तकनीकी उन्नति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को उजागर करता है।