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07 Oct 2026•
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पानीपत के युद्ध से लेकर आज तक: सिंधिया परिवार और बाबा मंसूर शाह की 300 वर्षीय गंगा-जमुनी तहजीब

✍️ Reporter: Pranav Gaur 🗓 07 Oct 2026, 11:18 AM 👁 17
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ग्वालियर के सिंधिया परिवार और बीड के सूफी संत बाबा मंसूर शाह के बीच की 300 साल पुरानी रिश्ते की अनोखी कहानी, जिसमें आधी रोटी का आशीर्वाद आज भी देवघर में सुरक्षित है।

ग्वालियर के शाही घराने की एक ऐतिहासिक और अनोखी परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो सिंधिया परिवार और बाबा मंसूर शाह के बीच गहरी आस्था, इतिहास और गंगा-जमुनी तहजीब का जीवंत उदाहरण है। यह करीब तीन सौ साल पुरानी रिवाज आज भी उसी श्रद्धा और निष्ठा के साथ निभाया जा रहा है।

इस कहानी की शुरुआत महाराष्ट्र से होती है, जहां सिंधिया परिवार की जड़ें सतारे के एक गांव से जुड़ी थीं, जबकि बाबा मंसूर शाह बीड जिले के प्रसिद्ध सूफी संत थे। महाराजा महादजी सिंधिया, जो बाद में इस राजवंश के सबसे प्रभावशाली शासक बने, बाबा को अपना गुरु मानते थे। सन् 1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध के दौरान महादजी गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिससे ग्वालियर में उनका परिवार बेचैन था। माता और पत्नी ने बाबा मंसूर शाह के पास जाकर स्थिति बताई, जिनके आश्वासन के बाद कुछ दिनों में ही महादजी सकुशल लौट आए। परिवार ने इसे बाबा के आशीर्वाद के रूप में स्वीकार किया।

बाबा ने महादजी को आधी रोटी का टुकड़ा देकर आशीर्वाद दिया था कि उनका वंश अगली पांच पीढ़ियों तक वैभव के साथ राज करेगा। यह आधी रोटी आज भी ग्वालियर के गोरखी स्थित देवघर में सुरक्षित रखी गई है, जिसे परिवार अपनी सबसे पवित्र धरोहर मानता है। इस आशीर्वाद को याद रखते हुए महादजी ने अपना साम्राज्य मजबूत किया और अपनी राजधानी उज्जैन से ग्वालियर तक विस्तारित की, जिससे सिंधिया राजवंश इतिहास में अमर हो गया।

आज भी यह परंपरा जीवित है। गोरखी के देवघर में कुलदेवता ज्योतिबा नाथ महाराज की मूर्तियों के साथ-साथ बाबा मंसूर शाह से जुड़ी वस्तुएं भी सुरक्षित हैं, जहां आरती और इबादत दोनों होती हैं। हर साल बाबा के उर्स पर परिवार का मुखिया पारंपरिक परिधान में पहुंचता है। पूजा तब तक जारी रहती है जब तक शिवलिंग या गुंबद से एक फूल चादर पर नहीं गिर जाता, उसके बाद ही आशीर्वाद लिया जाता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी इस पारंपरिक रिवाज को आज भी उसी निष्ठा से निभा रहे हैं।
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