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पिंड दान के साथ पूर्वजों कि वंशावली का अनोखा संसार है गयाजी में
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गयाजी से पिंडदान के साथ पुर्वजों कि वंशावली का अनोखा संसार है गयाजी में आज भी जीवंत है
गयाजी से अवनीश कुमार कि रिपोर्ट
पिंडदान के साथ पूर्वजों की वंशावली का अनोखा संसार, गया जी में आज भी जीवंत है बही-खातों की परंपरा
गया। विश्व प्रसिद्ध मोक्षभूमि गया जी में पिंडदान और श्राद्ध की परंपरा के साथ गयापाल पंडों द्वारा बही-खातों को सुरक्षित रखने की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है। डिजिटल दौर में भी गयापाल पंडों के पास सैकड़ों वर्ष पुराने बही-खाते सुरक्षित होने की बात कही जाती है। इन पोथियों में गया जी आने वाले तीर्थयात्रियों के साथ उनके पूर्वजों की कई पीढ़ियों का लेखा-जोखा दर्ज रहता है।
बताया जाता है कि पुराने समय में तीर्थयात्रियों का विवरण भोजपत्र और ताम्रपत्र पर लिखा जाता था। समय के साथ इसका स्वरूप बदला और कागज के बही-खाते चलन में आए। गयापाल पंडा समाज आज भी इन पुराने दस्तावेजों को अपनी पूर्वजों की धरोहर मानकर संभालकर रखता है। कुछ स्थानों पर भोजपत्र और ताम्रपत्र से जुड़े पुराने अभिलेख भी सुरक्षित बताए जाते हैं।
गया जी आने वाले किसी तीर्थयात्री के पूर्वज पहले यहां पिंडदान के लिए आए हों, तो संबंधित गयापाल पंडा के पास उनका रिकॉर्ड खोजा जाता है। इसके लिए तीर्थयात्री को अपने राज्य, जिला, तहसील और गांव की जानकारी देनी होती है। इसके बाद पुराने बही-खातों में पूर्वजों के नाम और अन्य विवरण तलाशे जाते हैं। कई बही-खातों में तीन से सात पीढ़ियों तक की जानकारी मिलने की बात कही जाती है। कुछ पोथियों में तीर्थयात्रियों के हस्ताक्षर तथा स्थायी और अस्थायी निवास की जानकारी भी दर्ज रहती है।
बही-खातों को पंडा पोथी भी कहा जाता है। इसमें नए आने वाले तीर्थयात्री का नाम-पता दर्ज करने के साथ हस्ताक्षर और निवास संबंधी जानकारी भी लिखी जाती है। पुराने रिकॉर्ड को व्यवस्थित रखने और समय-समय पर उसका नवीनीकरण करने के लिए मुंशी भी रखे जाते हैं।
गयापाल पंडा सह तीर्थ वीर्त सुधारिणी सभा इलाके चौदह सईयां पंडा समाज के अध्यक्ष गजाधर लाल कटरियार के अनुसार, बही-खाते की परंपरा काफी पुरानी है। पहले भोजपत्र और ताम्रपत्र का इस्तेमाल होता था, जबकि अब कागज के बही-खाते प्रचलन में हैं। क्षेत्रवार गयापाल पंडों के बीच जजमानी की व्यवस्था भी पुरानी परंपरा के अनुसार चली आ रही है।
इस तरह गया जी के बही-खाते केवल कागजों का संग्रह नहीं, बल्कि तीर्थयात्रियों को उनके पूर्वजों और पारिवारिक इतिहास से जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण परंपरा के रूप में आज भी जीवंत हैं।
बाइट गजाधर लाल कटरियार, अध्यक्ष, तीर्थ-वीर्त सुधारिणी सभा इलाके चौदह सईयां पंडा समाज, गया।
पिंडदान के साथ पूर्वजों की वंशावली का अनोखा संसार, गया जी में आज भी जीवंत है बही-खातों की परंपरा
गया। विश्व प्रसिद्ध मोक्षभूमि गया जी में पिंडदान और श्राद्ध की परंपरा के साथ गयापाल पंडों द्वारा बही-खातों को सुरक्षित रखने की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है। डिजिटल दौर में भी गयापाल पंडों के पास सैकड़ों वर्ष पुराने बही-खाते सुरक्षित होने की बात कही जाती है। इन पोथियों में गया जी आने वाले तीर्थयात्रियों के साथ उनके पूर्वजों की कई पीढ़ियों का लेखा-जोखा दर्ज रहता है।
बताया जाता है कि पुराने समय में तीर्थयात्रियों का विवरण भोजपत्र और ताम्रपत्र पर लिखा जाता था। समय के साथ इसका स्वरूप बदला और कागज के बही-खाते चलन में आए। गयापाल पंडा समाज आज भी इन पुराने दस्तावेजों को अपनी पूर्वजों की धरोहर मानकर संभालकर रखता है। कुछ स्थानों पर भोजपत्र और ताम्रपत्र से जुड़े पुराने अभिलेख भी सुरक्षित बताए जाते हैं।
गया जी आने वाले किसी तीर्थयात्री के पूर्वज पहले यहां पिंडदान के लिए आए हों, तो संबंधित गयापाल पंडा के पास उनका रिकॉर्ड खोजा जाता है। इसके लिए तीर्थयात्री को अपने राज्य, जिला, तहसील और गांव की जानकारी देनी होती है। इसके बाद पुराने बही-खातों में पूर्वजों के नाम और अन्य विवरण तलाशे जाते हैं। कई बही-खातों में तीन से सात पीढ़ियों तक की जानकारी मिलने की बात कही जाती है। कुछ पोथियों में तीर्थयात्रियों के हस्ताक्षर तथा स्थायी और अस्थायी निवास की जानकारी भी दर्ज रहती है।
बही-खातों को पंडा पोथी भी कहा जाता है। इसमें नए आने वाले तीर्थयात्री का नाम-पता दर्ज करने के साथ हस्ताक्षर और निवास संबंधी जानकारी भी लिखी जाती है। पुराने रिकॉर्ड को व्यवस्थित रखने और समय-समय पर उसका नवीनीकरण करने के लिए मुंशी भी रखे जाते हैं।
गयापाल पंडा सह तीर्थ वीर्त सुधारिणी सभा इलाके चौदह सईयां पंडा समाज के अध्यक्ष गजाधर लाल कटरियार के अनुसार, बही-खाते की परंपरा काफी पुरानी है। पहले भोजपत्र और ताम्रपत्र का इस्तेमाल होता था, जबकि अब कागज के बही-खाते प्रचलन में हैं। क्षेत्रवार गयापाल पंडों के बीच जजमानी की व्यवस्था भी पुरानी परंपरा के अनुसार चली आ रही है।
इस तरह गया जी के बही-खाते केवल कागजों का संग्रह नहीं, बल्कि तीर्थयात्रियों को उनके पूर्वजों और पारिवारिक इतिहास से जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण परंपरा के रूप में आज भी जीवंत हैं।
बाइट गजाधर लाल कटरियार, अध्यक्ष, तीर्थ-वीर्त सुधारिणी सभा इलाके चौदह सईयां पंडा समाज, गया।