📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Vijayanarasimhan, K.
राजनीति
नए राष्ट्रभक्ति गीतों पर छात्र प्रदर्शन में उपयोग पर बहस
✍️ ThePrint
🗓 25 जुल. 2026, 10:49 AM
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नए राष्ट्रभक्ति गीतों का छात्र प्रदर्शन में उपयोग विवाद पैदा कर रहा है। ये गीत, जो पहले फिल्म रैंग दे बासंटी में थे, अब फिल्म निर्माताओं द्वारा पुनः उपयोग किए जा रहे हैं।
हाल ही में जारी हुए नए राष्ट्रभक्ति गीतों को भारतीय छात्र प्रदर्शन समूहों द्वारा अपनाया गया है, जिससे यह विवाद हुआ है कि क्या ये गीत नागरिक विरोध के लिए उपयुक्त हैं। आलोचकों का कहना है कि ये गीत, जो राष्ट्रीय गर्व को जगाते हैं, आंदोलन के मूल उद्देश्यों से हटाकर एक राष्ट्रभक्ति प्रदर्शन बना देते हैं।
यह विवाद तब और बढ़ गया जब छात्र समूहों ने इन गीतों को रैलियों में बजाया, जिससे आरोप लगे कि प्रदर्शन राजनीतिक कार्रवाई के बजाय राष्ट्रभक्ति के प्रदर्शन में बदल रहे हैं। कुछ कार्यकर्ता दावा करते हैं कि संगीत का भावनात्मक प्रभाव आंदोलन के मुख्य मुद्दों से ध्यान भटका देता है।
इन गीतों के मूल निर्माता, जो 2006 की फिल्म रैंग दे बासंटी के लिए प्रसिद्ध हैं, ने घोषणा की कि ये गीत फिल्म के ब्रांड के तहत पुनः जारी किए जाएंगे, यह कहते हुए कि संगीत का उद्देश्य सिनेमाई था, न कि राजनीतिक सक्रियता के लिए। इस कदम को कुछ लोग मूल कलात्मक अखंडता को पुनः प्राप्त करने के प्रयास के रूप में देखते हैं।
यह बहस सांस्कृतिक कलाकृतियों की राजनीतिक आंदोलनों में भूमिका के बारे में एक व्यापक प्रश्न को उजागर करती है और यह भी कि क्या राष्ट्रभक्ति संगीत प्रणालीगत परिवर्तन की मांगों के साथ सह-अस्तित्व रख सकता है।
हालांकि प्रदर्शन जारी हैं, इन गीतों के उपयोग पर चर्चा समर्थकों और विरोधियों दोनों के लिए एक प्रमुख विषय बनी हुई है।
यह विवाद तब और बढ़ गया जब छात्र समूहों ने इन गीतों को रैलियों में बजाया, जिससे आरोप लगे कि प्रदर्शन राजनीतिक कार्रवाई के बजाय राष्ट्रभक्ति के प्रदर्शन में बदल रहे हैं। कुछ कार्यकर्ता दावा करते हैं कि संगीत का भावनात्मक प्रभाव आंदोलन के मुख्य मुद्दों से ध्यान भटका देता है।
इन गीतों के मूल निर्माता, जो 2006 की फिल्म रैंग दे बासंटी के लिए प्रसिद्ध हैं, ने घोषणा की कि ये गीत फिल्म के ब्रांड के तहत पुनः जारी किए जाएंगे, यह कहते हुए कि संगीत का उद्देश्य सिनेमाई था, न कि राजनीतिक सक्रियता के लिए। इस कदम को कुछ लोग मूल कलात्मक अखंडता को पुनः प्राप्त करने के प्रयास के रूप में देखते हैं।
यह बहस सांस्कृतिक कलाकृतियों की राजनीतिक आंदोलनों में भूमिका के बारे में एक व्यापक प्रश्न को उजागर करती है और यह भी कि क्या राष्ट्रभक्ति संगीत प्रणालीगत परिवर्तन की मांगों के साथ सह-अस्तित्व रख सकता है।
हालांकि प्रदर्शन जारी हैं, इन गीतों के उपयोग पर चर्चा समर्थकों और विरोधियों दोनों के लिए एक प्रमुख विषय बनी हुई है।