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07 Sep 2026
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न जात-पात, न भेदभाव… 24 साल से गुरु की सेवा में समर्पित है दिल्ली का सेवक जत्था

✍️ Reporter: Rajeev Kumar Sharma 🗓 03 Sep 2026, 05:58 PM 👁 296
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24 साल से गुरु की सेवा में समर्पित ‘धन-धन गुरु रामदास सेवक जत्था’, हर महीने संगत को लेकर पहुंचता है दरबार साहिब

न जात-पात का बंधन, न कोई भेदभाव—गुरु का सिमरन, कीर्तन और संगत की सेवा ही जत्थे का उद्देश्य

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के शिव नगर से पिछले करीब 24 वर्षों से लगातार गुरु की सेवा में समर्पित ‘धन-धन गुरु रामदास सेवक जत्था’ धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक एकता और सेवा की मिसाल पेश कर रहा है। जत्था हर महीने दिल्ली के अलग-अलग इलाकों से लगभग 250 श्रद्धालुओं की संगत को श्री दरबार साहिब, अमृतसर लेकर जाता है।

इस जत्थे की सबसे खास बात यह है कि यहां सेवा और संगत के लिए जात-पात या किसी तरह का भेदभाव नहीं है। गुरु की भक्ति, सिमरन और सेवा को ही सर्वोपरि मानते हुए विभिन्न क्षेत्रों से लोग इस यात्रा में शामिल होते हैं।

भारतीय रेल के माध्यम से होने वाली इस यात्रा का माहौल भी अपने आप में खास होता है। ट्रेन में सफर के दौरान संगत गुरु का सिमरन और कीर्तन करती है। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के लिए चाय, नाश्ता और भोजन की व्यवस्था जत्थे के सेवादारों द्वारा की जाती है, जिससे पूरी यात्रा श्रद्धा और सेवा के वातावरण में बदल जाती है।

इस सेवा कार्य को सुचारू रूप से चलाने में जत्थे के कई सेवादार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सोनू वीर जी, ढींगरा वीर जी, काका वीर जी, जे.पी. वीर जी, मल्होत्रा वीर जी और नीटू वीर जी सहित अन्य सेवादार संगत की जरूरतों का ध्यान रखते हैं। भोजन से लेकर यात्रा व्यवस्था और अन्य आवश्यक सेवाओं तक, सेवादार अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाते हैं।

अमृतसर पहुंचने के बाद संगत के ठहरने की व्यवस्था भी जत्थे के सेवादारों द्वारा की जाती है। श्री दरबार साहिब में AC कमरों की व्यवस्था कर संगत को आरामदायक ठहराव उपलब्ध कराया जाता है, ताकि श्रद्धालु बिना किसी परेशानी के गुरु घर में माथा टेक सकें और सेवा-सिमरन में समय व्यतीत कर सकें।

24 वर्षों की इस निरंतर सेवा यात्रा ने ‘धन-धन गुरु रामदास सेवक जत्था’ को केवल धार्मिक यात्रा कराने वाला समूह नहीं, बल्कि सेवा, संगत और सामाजिक भाईचारे का एक जीवंत उदाहरण बना दिया है। हर महीने सैकड़ों लोगों को एक साथ गुरु घर से जोड़ने वाली यह पहल बताती है कि जब सेवा का उद्देश्य निस्वार्थ हो तो रास्ते खुद बनते चले जाते हैं।

जत्थे से जुड़े सेवादारों का मानना है कि गुरु की सेवा में किया गया प्रत्येक कार्य अपने आप में सौभाग्य है। इसी भावना के साथ पिछले 24 वर्षों से यह सिलसिला लगातार जारी है और संगत को गुरु घर से जोड़ने का प्रयास निरंतर किया जा रहा है।
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