📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Yann Forget
राजनीति
मध्य प्रदेश नगर निकायों पर कचरा वाहन की कीमत में अंतर के कारण जांच का दायरा
✍️ Amar Ujala · Bhopal
🗓 22 अक्टू. 2026, 08:31 AM
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मध्य प्रदेश के नगर निकायों द्वारा कचरा वाहन, एलईडी लाइट और कीटाणुनाशक की खरीद में बड़ी कीमतों में अंतर मिलने पर जांच शुरू हुई है।
मध्य प्रदेश के कई नगर निकायों के खरीद अभिलेखों की जांच में कचरा संग्रह वाहन, एलईडी लाइट और कीटाणुनाशक की कीमतों में बड़े अंतर सामने आए हैं। कुछ नगर निकायों ने कचरा वाहन के लिए केवल 2 लाख रुपये का भुगतान किया, जबकि समान वाहन के लिए अन्य ने 6 लाख रुपये तक का भुगतान किया, जिससे निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं।
यह अंतर केवल कचरा वाहनों तक सीमित नहीं है; एलईडी स्ट्रीट लाइट और कीटाणुनाशक की कीमतों में भी असंगतियां पाई गईं, जिससे यह संकेत मिलता है कि खरीद में व्यापक अनियमितता हो सकती है। राज्य के वित्त विभाग के अधिकारियों ने कहा है कि इन मामलों की गहन जांच आवश्यक है ताकि प्रक्रिया में किसी भी चूक या दुरुपयोग का पता चल सके।
राज्य सरकार ने सभी अनुबंधों की फोरेंसिक ऑडिट का आदेश दिया है और नगर निगमों से दो हफ्तों के भीतर सभी संबंधित दस्तावेज़ प्रस्तुत करने को कहा है। इस बीच, विपक्षी दलों ने विधायी जांच की मांग की है, जिससे सार्वजनिक खर्च में जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
यदि जांच में अनियमितताएं सिद्ध होती हैं, तो अधिकारियों को अनुबंध रद्द करने, अतिरिक्त खर्च की वसूली और संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की सिफारिश की जा सकती है। इस निर्णय का भविष्य में राज्य के नगर निकायों की खरीद नीतियों पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा।
यह मामला सार्वजनिक रूप से यह भी उजागर करता है कि सरकारी खरीद में उचित मूल्य निर्धारण और पारदर्शिता सुनिश्चित करना कितना महत्वपूर्ण है, विशेषकर स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे में बढ़ते खर्च के समय।
यह अंतर केवल कचरा वाहनों तक सीमित नहीं है; एलईडी स्ट्रीट लाइट और कीटाणुनाशक की कीमतों में भी असंगतियां पाई गईं, जिससे यह संकेत मिलता है कि खरीद में व्यापक अनियमितता हो सकती है। राज्य के वित्त विभाग के अधिकारियों ने कहा है कि इन मामलों की गहन जांच आवश्यक है ताकि प्रक्रिया में किसी भी चूक या दुरुपयोग का पता चल सके।
राज्य सरकार ने सभी अनुबंधों की फोरेंसिक ऑडिट का आदेश दिया है और नगर निगमों से दो हफ्तों के भीतर सभी संबंधित दस्तावेज़ प्रस्तुत करने को कहा है। इस बीच, विपक्षी दलों ने विधायी जांच की मांग की है, जिससे सार्वजनिक खर्च में जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
यदि जांच में अनियमितताएं सिद्ध होती हैं, तो अधिकारियों को अनुबंध रद्द करने, अतिरिक्त खर्च की वसूली और संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की सिफारिश की जा सकती है। इस निर्णय का भविष्य में राज्य के नगर निकायों की खरीद नीतियों पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा।
यह मामला सार्वजनिक रूप से यह भी उजागर करता है कि सरकारी खरीद में उचित मूल्य निर्धारण और पारदर्शिता सुनिश्चित करना कितना महत्वपूर्ण है, विशेषकर स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे में बढ़ते खर्च के समय।