राजनीति
लोकतंत्र बचाओ रैली के लिए सड़कें जाम थीं, लेकिन एक पिता अपने बेटे की जिंदगी बचाने के लिए हाथ जोड़कर रास्ता मांगता रहा! कानपुर में भाजपा की लोकतंत्र बचाओ रैली के दौरान लगे भीषण ट्रैफिक जाम में 22 वर्षीय सिपाही प्रांशु सचान की जिंदगी ह
लोकतंत्र बचाओ रैली के लिए सड़कें जाम थीं, लेकिन एक पिता अपने बेटे की जिंदगी बचाने के लिए हाथ जोड़कर रास्ता मांगता रहा!
कानपुर में भाजपा की लोकतंत्र बचाओ रैली के दौरान लगे भीषण ट्रैफिक जाम में 22 वर्षीय सिपाही प्रांशु सचान की जिंदगी हार गई। फतेहपुर में डंपर की टक्कर से गंभीर रूप से घायल प्रांशु को एंबुलेंस से हैलट अस्पताल लाया जा रहा था, लेकिन टाटमिल चौराहे पर एंबुलेंस करीब डेढ़ से दो घंटे तक जाम में फंसी रही।
एक तरफ सत्ता के सियासी आयोजन की भीड़ थी, दूसरी तरफ एंबुलेंस में जिंदगी और मौत के बीच जूझता एक नौजवान। बेबस पिता लोगों और पुलिसकर्मियों के सामने हाथ जोड़कर रास्ता मांगता रहा, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही बेटे की सांसें थम गईं।
सवाल सत्ता से है, सवाल प्रशासन से है!
लोकतंत्र बचाने निकले सत्ताधारियों के आयोजन में क्या एक जिंदगी बचाने के लिए रास्ता नहीं बचना चाहिए था? क्या राजनीतिक रैलियों और वीआईपी आयोजनों के दौरान एंबुलेंस के लिए ग्रीन कॉरिडोर सुनिश्चित करना जिम्मेदारों का कर्तव्य नहीं है?
लोकतंत्र सिर्फ रैलियों और नारों से नहीं बचता, बल्कि जनता की जिंदगी और उसके अधिकारों की रक्षा से बचता है।
सत्ता किसी की भी हो, लेकिन किसी भी राजनीतिक आयोजन से बड़ी इंसान की जिंदगी होनी चाहिए!
📍 कानपुर, उत्तर प्रदेश
GROUND ZERO NEWS
सच की शुरुआत ग्राउंड जीरो से!
#Kanpur #KanpurNews #GroundZeroNews #BJP #Democracy #TrafficJam #Ambulance #PranshuSachan #KanpurBreaking #UPNews #Administration #BreakingNews
कानपुर में भाजपा की लोकतंत्र बचाओ रैली के दौरान लगे भीषण ट्रैफिक जाम में 22 वर्षीय सिपाही प्रांशु सचान की जिंदगी हार गई। फतेहपुर में डंपर की टक्कर से गंभीर रूप से घायल प्रांशु को एंबुलेंस से हैलट अस्पताल लाया जा रहा था, लेकिन टाटमिल चौराहे पर एंबुलेंस करीब डेढ़ से दो घंटे तक जाम में फंसी रही।
एक तरफ सत्ता के सियासी आयोजन की भीड़ थी, दूसरी तरफ एंबुलेंस में जिंदगी और मौत के बीच जूझता एक नौजवान। बेबस पिता लोगों और पुलिसकर्मियों के सामने हाथ जोड़कर रास्ता मांगता रहा, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही बेटे की सांसें थम गईं।
सवाल सत्ता से है, सवाल प्रशासन से है!
लोकतंत्र बचाने निकले सत्ताधारियों के आयोजन में क्या एक जिंदगी बचाने के लिए रास्ता नहीं बचना चाहिए था? क्या राजनीतिक रैलियों और वीआईपी आयोजनों के दौरान एंबुलेंस के लिए ग्रीन कॉरिडोर सुनिश्चित करना जिम्मेदारों का कर्तव्य नहीं है?
लोकतंत्र सिर्फ रैलियों और नारों से नहीं बचता, बल्कि जनता की जिंदगी और उसके अधिकारों की रक्षा से बचता है।
सत्ता किसी की भी हो, लेकिन किसी भी राजनीतिक आयोजन से बड़ी इंसान की जिंदगी होनी चाहिए!
📍 कानपुर, उत्तर प्रदेश
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सच की शुरुआत ग्राउंड जीरो से!
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