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15 Oct 2026•
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Agriculture

कुशलगढ़ के जनजाति किसान अपना रहे फल बागवानी, सुयश ट्रस्ट के मार्गदर्शन में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर

✍️ Reporter: Naman soni 🗓 15 Oct 2026, 10:38 AM 👁 13
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पुणे स्थित सुयश चैरिटेबल ट्रस्ट के मार्गदर्शन में कुशलगढ़ क्षेत्र के जनजाति किसान पारंपरिक खेती से हटकर फल बागवानी और जैविक खेती को अपनाकर आर्थिक समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं। मिठुसिंह देवदा जैसे किसान लाखों की आमदनी की उम्मीद कर रहे हैं।

जनजाति बहुल कुशलगढ़ क्षेत्र में खेती को लाभकारी बनाने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सुयश चैरिटेबल ट्रस्ट, पुणे के मार्गदर्शन में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। परंपरागत खेती के साथ फल बागवानी और जैविक खेती को अपनाकर किसान अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं। ग्राम निशनावट के किसान मिठुसिंह देवदा इसका एक प्रेरणादायक उदाहरण हैं, जिन्होंने सीमित पानी की उपलब्धता के बावजूद नवसारी की प्रसिद्ध 'ललित' वैरायटी के अमरूद के 430 पौधे लगाए हैं। बागवानी शुरू करने के छह माह बाद ही पौधों में फल आने लगे हैं और किसान जैविक खाद का उपयोग कर रहे हैं।

मिठुसिंह देवदा के अनुसार, परंपरागत खेती से जहां सालाना लगभग 15 हजार रुपये की आमदनी होती थी, वहीं अमरूद की बागवानी से इस वर्ष लाखों रुपये की आमदनी होने की उम्मीद है। सुयश चैरिटेबल ट्रस्ट के मार्गदर्शन में कुशलगढ़ क्षेत्र के अनेक किसान किसान उत्पादक संगठन (FPO) से जुड़कर संगठित खेती की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ट्रस्ट किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने, रसायन मुक्त फल एवं सब्जियों के उत्पादन को बढ़ावा देने और कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने के प्रयास कर रहा है।

इन प्रयासों से किसानों में खेती के प्रति नई सोच विकसित हो रही है। एक समय रोजगार की तलाश में गुजरात पलायन करने वाले जनजाति किसान अब अपने गांव में ही कृषि में नए प्रयोगों, जैविक खाद के उपयोग, फल बागवानी और किसान उत्पादक संगठन से जुड़ाव के माध्यम से रोजगार और आय के अवसर विकसित कर रहे हैं। सुयश के राजस्थान प्रबंधक भरत कुमावत पिछले 12 वर्षों से जनजाति समाज में कृषि विकास और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए प्रयासरत हैं।

किसान मिठुसिंह देवदा के अमरूद बाग के निरीक्षण के दौरान अन्य किसानों ने भी बागवानी की प्रगति का अवलोकन किया और फल उत्पादन के माध्यम से आय बढ़ाने की संभावनाओं पर चर्चा की। कुशलगढ़ के जनजाति किसानों का यह प्रयास दर्शाता है कि उचित मार्गदर्शन, आधुनिक कृषि तकनीक, जैविक खाद और किसान संगठन के सहयोग से खेती को समृद्धि का माध्यम बनाया जा सकता है, जिससे किसान आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
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