📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Muhammad Mahdi Karim/ Augustus Binu
राजनीति
कर्नाटक हाई कोर्ट ने 2022 का एससी/एसटी आरक्षण संशोधन रद्द किया
✍️ News On AIR
🗓 16 अक्टू. 2026, 06:32 AM
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कर्नाटक हाई कोर्ट ने 2022 में पास हुए एससी/एसटी आरक्षण बढ़ाने वाले कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया, राज्य सरकार के संशोधन को रद्द किया।
बेंगलुरु स्थित कर्नाटक हाई कोर्ट ने गुरुवार को एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए 2022 में पारित उस संशोधन को रद्द कर दिया, जिसमें अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के आरक्षण प्रतिशत को बढ़ाने का प्रावधान था। कोर्ट ने कहा कि यह संशोधन संविधान में निर्धारित कुल आरक्षण सीमा का उल्लंघन करता है।
विवादित कानून ने राज्य सरकार को सार्वजनिक रोजगार और शैक्षणिक संस्थानों में एससी/एसटी का कोटा 15% से बढ़ाकर 18% करने की अनुमति दी थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह वृद्धि सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा सावनी मामले में निर्धारित 50% की अधिकतम सीमा का उल्लंघन करती है।
न्यायालय ने कहा कि आरक्षण प्रतिशत में कोई भी परिवर्तन संविधानिक सीमा के भीतर होना चाहिए और इसके लिए विस्तृत जनसांख्यिकीय अध्ययन आवश्यक है, जो 2022 के संशोधन में नहीं किया गया। इसलिए इस कानून को शून्य घोषित कर दिया गया और पूर्व की आरक्षण व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया गया।
इस निर्णय के बाद राज्य की आरक्षण नीति की पुनः समीक्षा की संभावना है और आगे कानूनी चुनौतियों या विधायी संशोधनों की आशंका बनी हुई है। सरकार ने कहा कि कोर्ट के बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए भविष्य में कोई नया प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फ़ैसला आरक्षण नीतियों को संविधानिक सीमाओं के भीतर रखने में न्यायपालिका की भूमिका को सुदृढ़ करता है और अन्य राज्यों में चल रहे समान बहसों पर भी असर डाल सकता है।
विवादित कानून ने राज्य सरकार को सार्वजनिक रोजगार और शैक्षणिक संस्थानों में एससी/एसटी का कोटा 15% से बढ़ाकर 18% करने की अनुमति दी थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह वृद्धि सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा सावनी मामले में निर्धारित 50% की अधिकतम सीमा का उल्लंघन करती है।
न्यायालय ने कहा कि आरक्षण प्रतिशत में कोई भी परिवर्तन संविधानिक सीमा के भीतर होना चाहिए और इसके लिए विस्तृत जनसांख्यिकीय अध्ययन आवश्यक है, जो 2022 के संशोधन में नहीं किया गया। इसलिए इस कानून को शून्य घोषित कर दिया गया और पूर्व की आरक्षण व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया गया।
इस निर्णय के बाद राज्य की आरक्षण नीति की पुनः समीक्षा की संभावना है और आगे कानूनी चुनौतियों या विधायी संशोधनों की आशंका बनी हुई है। सरकार ने कहा कि कोर्ट के बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए भविष्य में कोई नया प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फ़ैसला आरक्षण नीतियों को संविधानिक सीमाओं के भीतर रखने में न्यायपालिका की भूमिका को सुदृढ़ करता है और अन्य राज्यों में चल रहे समान बहसों पर भी असर डाल सकता है।