📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Jorge Royan
टेक्नोलॉजी
भारत ने 2030 तक 5 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन क्षमता का लक्ष्य तय किया
✍️ TripuraTimes.com
🗓 29 अक्टू. 2026, 05:32 AM
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सरकार ने 2030 तक 5 MT ग्रीन हाइड्रोजन क्षमता हासिल करने का लक्ष्य घोषित किया, जिससे स्वच्छ ऊर्जा में बदलाव तेज होगा।
नई दिल्ली – केंद्र सरकार ने अगले दशक के अंत तक 5 मिलियन टन (MT) ग्रीन हाइड्रोजन क्षमता हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। यह आंकड़ा नवीकरणीय बिजली से इलेक्ट्रोलाइज़र द्वारा उत्पन्न हाइड्रोजन की कुल स्थापित क्षमता को दर्शाता है, जिसमें कोई कार्बन उत्सर्जन नहीं होता।
यह कदम भारत की पेरिस समझौते के तहत जलवायु प्रतिबद्धताओं और राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन के साथ संरेखित है, जिसका उद्देश्य देश को स्वच्छ हाइड्रोजन का प्रमुख निर्यातक बनाना है। अधिकारियों ने बताया कि यह लक्ष्य सार्वजनिक‑निजी भागीदारी, नवीकरणीय ऊर्जा के लिए प्रोत्साहन और बड़े‑पैमाने पर परियोजनाओं के लिए तेज़ अनुमोदन के माध्यम से पूरा किया जाएगा।
विश्लेषकों का मानना है कि 5 MT लक्ष्य तक पहुंचने के लिए नवीकरणीय उत्पादन, ग्रिड अपग्रेड और जल‑स्रोत बुनियादी ढांचे में भारी निवेश आवश्यक होगा। सरकार ने घरेलू और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए वित्तीय समर्थन और कर छूट की घोषणा की है, साथ ही तटीय बंदरगाहों पर निर्यात केंद्र विकसित करने की योजना भी है।
इस लक्ष्य की पूर्ति से इस्पात, रसायन और परिवहन जैसे क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटेगी और हरे अर्थव्यवस्था में नई नौकरियों का सृजन होगा।
यह कदम भारत की पेरिस समझौते के तहत जलवायु प्रतिबद्धताओं और राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन के साथ संरेखित है, जिसका उद्देश्य देश को स्वच्छ हाइड्रोजन का प्रमुख निर्यातक बनाना है। अधिकारियों ने बताया कि यह लक्ष्य सार्वजनिक‑निजी भागीदारी, नवीकरणीय ऊर्जा के लिए प्रोत्साहन और बड़े‑पैमाने पर परियोजनाओं के लिए तेज़ अनुमोदन के माध्यम से पूरा किया जाएगा।
विश्लेषकों का मानना है कि 5 MT लक्ष्य तक पहुंचने के लिए नवीकरणीय उत्पादन, ग्रिड अपग्रेड और जल‑स्रोत बुनियादी ढांचे में भारी निवेश आवश्यक होगा। सरकार ने घरेलू और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए वित्तीय समर्थन और कर छूट की घोषणा की है, साथ ही तटीय बंदरगाहों पर निर्यात केंद्र विकसित करने की योजना भी है।
इस लक्ष्य की पूर्ति से इस्पात, रसायन और परिवहन जैसे क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटेगी और हरे अर्थव्यवस्था में नई नौकरियों का सृजन होगा।