📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Sumita Roy Dutta
बिज़नेस
एचपी हाई कोर्ट ने कहा, बैंक की कोविड-19 मोरैटरियम विस्तार RBI के NPA नियमों को नहीं टाल सकता
✍️ Live Law
🗓 12 अक्टू. 2026, 06:03 PM
👁 20
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि बैंक द्वारा कोविड-19 मोरैटरियम का विस्तार RBI के NPA नियमों को नहीं बदल सकता।
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि कोविड‑19 मोरैटरियम को बढ़ाने का निर्णय बैंक को भारतीय रिज़र्व बैंक के गैर‑परफॉर्मिंग एसेट (NPA) नियमों से मुक्त नहीं करता। कोर्ट ने कहा कि ऋण वर्गीकरण से जुड़े नियामक दिशा‑निर्देश किसी भी अस्थायी राहत के बावजूद लागू रहेंगे।
RBI के नियम के अनुसार, जब मूलधन या ब्याज का भुगतान 90 दिन से अधिक देर हो जाता है तो ऋण को NPA माना जाता है। कोर्ट ने कहा कि मोरैटरियम का विस्तार इस सीमा को बदल नहीं सकता और बैंकों को अपने NPA रिकॉर्ड को नियामक निर्देशों के अनुसार ही अपडेट करना होगा।
यह फैसला दर्शाता है कि मोरैटरियम केवल उधारकर्ताओं को अल्पकालिक राहत देता है, परन्तु बैंकों को नियामक अनुपालन से नहीं बचाता। मोरैटरियम समाप्त होने पर बैंकों को बकाया राशि को NPA में दर्ज करना पड़ेगा, जिससे बैंकिंग क्षेत्र की पारदर्शिता बनी रहेगी।
वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि इस निर्णय के बाद बैंकों को अपने क्रेडिट मॉनिटरिंग प्रक्रियाओं की पुनः समीक्षा करनी पड़ेगी और ग्राहकों को मोरैटरियम के NPA वर्गीकरण पर प्रभाव के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी होगी।
RBI के नियम के अनुसार, जब मूलधन या ब्याज का भुगतान 90 दिन से अधिक देर हो जाता है तो ऋण को NPA माना जाता है। कोर्ट ने कहा कि मोरैटरियम का विस्तार इस सीमा को बदल नहीं सकता और बैंकों को अपने NPA रिकॉर्ड को नियामक निर्देशों के अनुसार ही अपडेट करना होगा।
यह फैसला दर्शाता है कि मोरैटरियम केवल उधारकर्ताओं को अल्पकालिक राहत देता है, परन्तु बैंकों को नियामक अनुपालन से नहीं बचाता। मोरैटरियम समाप्त होने पर बैंकों को बकाया राशि को NPA में दर्ज करना पड़ेगा, जिससे बैंकिंग क्षेत्र की पारदर्शिता बनी रहेगी।
वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि इस निर्णय के बाद बैंकों को अपने क्रेडिट मॉनिटरिंग प्रक्रियाओं की पुनः समीक्षा करनी पड़ेगी और ग्राहकों को मोरैटरियम के NPA वर्गीकरण पर प्रभाव के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी होगी।