📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / NASA
मौसम
नेपाल से उत्तराखंड तक हिमालय की चोटियां चेतावनी देतीं, श्याम सारण का संदेश
✍️ The Indian Express
🗓 28 अग. 2026, 05:33 PM
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पूर्व राजनयिक श्याम सारण ने चेतावनी दी है कि नेपाल से उत्तराखंड तक चीन तक हिमालय में तेज़ी से बर्फ़ पिघलना और अस्थिर मौसम एक गंभीर जलवायु संकट का संकेत हैं।
पूर्व राजनयिक श्याम सारण ने हिमालय की चोटियों में बढ़ते तनाव के संकेतों को उजागर किया है, जो नेपाल से लेकर उत्तराखंड और आगे चीन तक फैले हैं। उन्होंने तेज़ी से घटती बर्फ़ीली ग्लेशियर, बढ़ते भूस्खलन और अनियमित मानसून पैटर्न को इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र के गंभीर संकट के स्पष्ट संकेत बताया है।
सारण ने कहा कि ये परिवर्तन अकेले नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभाव का हिस्सा हैं, जो नीचे बहने वाले लाखों लोगों की जल सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं। हिमालय, जिसे अक्सर "एशिया का जल टैंक" कहा जाता है, गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेकोंग जैसी प्रमुख नदियों को पोषित करता है, जिससे कृषि, ऊर्जा और आजीविका पर इसका प्रभाव अत्यधिक है।
उन्होंने दक्षिण एशियाई देशों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने, लचीलापन बढ़ाने वाले बुनियादी ढांचे में निवेश करने और ग्लेशियर पिघलने की सीमा‑पार निगरानी को सुदृढ़ करने के लिए त्वरित और समन्वित कदम उठाएँ। बिना ठोस कार्रवाई के, बाढ़, सूखा और सामाजिक‑आर्थिक अस्थिरता जैसी समस्याएँ और बढ़ सकती हैं।
लेख का निष्कर्ष यह है कि पहाड़ स्वयं चेतावनी दे रहे हैं; नीति निर्माताओं को इन चेतावनियों को ठोस जलवायु अनुकूलन नीतियों में बदलना होगा, इससे पहले कि स्थिति और बिगड़ जाए।
सारण ने कहा कि ये परिवर्तन अकेले नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभाव का हिस्सा हैं, जो नीचे बहने वाले लाखों लोगों की जल सुरक्षा को प्रभावित कर रहे हैं। हिमालय, जिसे अक्सर "एशिया का जल टैंक" कहा जाता है, गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेकोंग जैसी प्रमुख नदियों को पोषित करता है, जिससे कृषि, ऊर्जा और आजीविका पर इसका प्रभाव अत्यधिक है।
उन्होंने दक्षिण एशियाई देशों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने, लचीलापन बढ़ाने वाले बुनियादी ढांचे में निवेश करने और ग्लेशियर पिघलने की सीमा‑पार निगरानी को सुदृढ़ करने के लिए त्वरित और समन्वित कदम उठाएँ। बिना ठोस कार्रवाई के, बाढ़, सूखा और सामाजिक‑आर्थिक अस्थिरता जैसी समस्याएँ और बढ़ सकती हैं।
लेख का निष्कर्ष यह है कि पहाड़ स्वयं चेतावनी दे रहे हैं; नीति निर्माताओं को इन चेतावनियों को ठोस जलवायु अनुकूलन नीतियों में बदलना होगा, इससे पहले कि स्थिति और बिगड़ जाए।