📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Ministry of Finance of India
बिज़नेस
हरित बजटिंग से झारखंड के खर्च को जलवायु लक्ष्य के साथ जोड़ा जा सकता है
✍️ ET EnergyWorld
🗓 27 अग. 2026, 02:47 AM
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IEEFA ने कहा है कि हरित बजटिंग अपनाने से झारखंड अपने सार्वजनिक खर्च को जलवायु लक्ष्य के साथ संरेखित कर सकता है, यह ET EnergyWorld ने बताया।
Institute for Energy Economics and Financial Analysis (IEEFA) ने कहा है कि हरित बजटिंग झारखंड की वित्तीय नीतियों को जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों के साथ संरेखित करने में मदद कर सकती है, यह बात ET EnergyWorld ने रिपोर्ट की। यह थिंक‑टैंक मानता है कि बजट निर्णयों में पर्यावरणीय पहलुओं को शामिल करने से सार्वजनिक निधियों को शमन और अनुकूलन उपायों के लिए प्रभावी रूप से उपयोग किया जा सकेगा।
हरित बजटिंग का अर्थ है सभी सरकारी खर्चों के कार्बन प्रभाव का मूल्यांकन करना और कम‑कार्बन या जलवायु‑सहनीय परियोजनाओं को प्राथमिकता देना। विभिन्न कार्यक्रमों से जुड़े उत्सर्जन को मापकर नीति निर्माताओं को नवीकरणीय ऊर्जा, सतत परिवहन, वनीकरण और अन्य जलवायु‑अनुकूल पहलों की ओर संसाधन पुनःनिर्देशित करने में मदद मिलती है।
IEEFA ने बताया कि खनन और कोयले पर निर्भर झारखंड को इस दृष्टिकोण से आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में लाभ हो सकता है। यह सुझाव राज्य के वित्त विभाग के अगले वित्तीय योजना तैयार करने के समय आया है, और अधिकारियों ने जलवायु‑संबंधित बजट फ्रेमवर्क की जांच करने में रुचि दिखाई है।
ऐसे मॉडल को अपनाने से पारदर्शिता भी बढ़ेगी, जिससे नागरिक और निवेशक देख सकेंगे कि जलवायु लक्ष्य सार्वजनिक खर्च में कैसे प्रतिबिंबित हो रहे हैं। यह अन्य भारतीय राज्यों के लिए एक उदाहरण बन सकता है, जो सीमित वित्तीय संसाधनों के साथ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।
हरित बजटिंग का अर्थ है सभी सरकारी खर्चों के कार्बन प्रभाव का मूल्यांकन करना और कम‑कार्बन या जलवायु‑सहनीय परियोजनाओं को प्राथमिकता देना। विभिन्न कार्यक्रमों से जुड़े उत्सर्जन को मापकर नीति निर्माताओं को नवीकरणीय ऊर्जा, सतत परिवहन, वनीकरण और अन्य जलवायु‑अनुकूल पहलों की ओर संसाधन पुनःनिर्देशित करने में मदद मिलती है।
IEEFA ने बताया कि खनन और कोयले पर निर्भर झारखंड को इस दृष्टिकोण से आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में लाभ हो सकता है। यह सुझाव राज्य के वित्त विभाग के अगले वित्तीय योजना तैयार करने के समय आया है, और अधिकारियों ने जलवायु‑संबंधित बजट फ्रेमवर्क की जांच करने में रुचि दिखाई है।
ऐसे मॉडल को अपनाने से पारदर्शिता भी बढ़ेगी, जिससे नागरिक और निवेशक देख सकेंगे कि जलवायु लक्ष्य सार्वजनिक खर्च में कैसे प्रतिबिंबित हो रहे हैं। यह अन्य भारतीय राज्यों के लिए एक उदाहरण बन सकता है, जो सीमित वित्तीय संसाधनों के साथ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं।