📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Gyanendrasinghchauha…
अपराध
पूर्व नेता प्रतिपक्ष ने एमपी हाईकोर्ट में 45 साल पुराने डकैत विरोधी कानून को चुनौती दी
✍️ Amar Ujala · Madhya Pradesh
🗓 03 सित. 2026, 07:17 PM
👁 14
एक पूर्व नेता प्रतिपक्ष ने एमपी हाईकोर्ट में 45 साल पुराने डकैत विरोधी कानून को रद्द करने की याचिका दायर की है, जबकि चंबल क्षेत्र से डकैतों का प्रकोप समाप्त हो चुका है।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सोमवार को एक पूर्व नेता प्रतिपक्ष की याचिका प्राप्त की, जिसमें 45 साल पुराने डकैत विरोधी अधिनियम को निरस्त करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह कानून, जो मूलतः चंबल क्षेत्र में डकैतों को रोकने के लिये बनाया गया था, अब बेकार हो गया है क्योंकि अब वहाँ संगठित डकैतों की समस्या नहीं रही।
दायर दस्तावेज़ में कहा गया है कि यह अधिनियम अभी भी कठोर दंड और प्रक्रियात्मक प्रावधान लागू करता है, जो वर्तमान सुरक्षा स्थिति के अनुकूल नहीं हैं। याचिकाकर्ता चाहता है कि अदालत इस अधिनियम को संवैधानिक न्यायसंगतता के विरुद्ध घोषित करे और इसके प्रवर्तन से नागरिक स्वतंत्रताओं पर पड़ने वाले प्रभाव को रद्द करे।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में इस कानून का प्रयोग बहुत कम हुआ है, फिर भी यह अभी भी विधि पुस्तिका में मौजूद है और भविष्य में अभियोजन के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। राज्य सरकार से भी तर्क सुनने की उम्मीद है, जो कहेगी कि यह कानून अभी भी एक निवारक शक्ति के रूप में कार्य करता है और इसे बरकरार रखना चाहिए।
यदि अदालत याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देती है, तो यह राज्य में पुराने एंटी‑बैंडिट्री कानूनों के प्रयोग में बड़ा बदलाव लाएगा और अन्य अप्रचलित विधियों की पुनरावलोकन प्रक्रिया को तेज़ कर सकता है।
यह मामला भारत में उन पुराने कानूनों के पुनः मूल्यांकन पर व्यापक चर्चा को उजागर करता है, जो अब की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाते, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ मूल खतरा समाप्त हो चुका है।
दायर दस्तावेज़ में कहा गया है कि यह अधिनियम अभी भी कठोर दंड और प्रक्रियात्मक प्रावधान लागू करता है, जो वर्तमान सुरक्षा स्थिति के अनुकूल नहीं हैं। याचिकाकर्ता चाहता है कि अदालत इस अधिनियम को संवैधानिक न्यायसंगतता के विरुद्ध घोषित करे और इसके प्रवर्तन से नागरिक स्वतंत्रताओं पर पड़ने वाले प्रभाव को रद्द करे।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में इस कानून का प्रयोग बहुत कम हुआ है, फिर भी यह अभी भी विधि पुस्तिका में मौजूद है और भविष्य में अभियोजन के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है। राज्य सरकार से भी तर्क सुनने की उम्मीद है, जो कहेगी कि यह कानून अभी भी एक निवारक शक्ति के रूप में कार्य करता है और इसे बरकरार रखना चाहिए।
यदि अदालत याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देती है, तो यह राज्य में पुराने एंटी‑बैंडिट्री कानूनों के प्रयोग में बड़ा बदलाव लाएगा और अन्य अप्रचलित विधियों की पुनरावलोकन प्रक्रिया को तेज़ कर सकता है।
यह मामला भारत में उन पुराने कानूनों के पुनः मूल्यांकन पर व्यापक चर्चा को उजागर करता है, जो अब की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाते, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ मूल खतरा समाप्त हो चुका है।