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फतेहपुर का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: 11 अगस्त 1942 की गौरवगाथा
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फतेहपुर गांव ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 11 अगस्त 1942 को यहां से हजारों लोग पटना कूच में शामिल हुए थे।
फतेहपुर, पटना | 11 अगस्त 2026। पुनपुन नदी के तट पर बसा फतेहपुर गांव स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली विरासत को आज भी संजोए हुए है। वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ और ‘करो या मरो’ के आह्वान का असर फतेहपुर और आसपास के क्षेत्रों में भी व्यापक रूप से देखने को मिला था। स्थानीय बुजुर्गों और इतिहास से जुड़े लोगों के अनुसार 11 अगस्त 1942 को फतेहपुर से बड़ी संख्या में लोग पटना सचिवालय की ओर कूच कर गए थे।
इसी दिन पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने निकले निहत्थे छात्रों पर अंग्रेजी हुकूमत ने गोली चला दी थी, जिसमें सात युवा शहीद हुए। अमर शहीदों में रामानंद सिंह, उमाकांत प्रसाद सिंह, सतीश प्रसाद झा, जितिन कुमार सिंह, राजेंद्र सिंह, रामगोपति सिंह और देवी पद चौधरी शामिल थे।
स्थानीय इतिहास में फतेहपुर के कई स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान भी दर्ज है। इनमें रमन बिहारी सिंह उर्फ ‘गांधी जी’, जगदीश सिंह, चंदेश्वर प्रसाद सिंह उर्फ ‘आजाद साहब’, राम नेवाजी सिंह, विश्वनाथ सिंह, लालदेव सिंह, तोताराम और केदार सिंह उर्फ ‘केदार बाबा’ के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। रमन बिहारी सिंह को गांव में सम्मानपूर्वक ‘गांधी जी’ कहा जाता था। उनके पौत्र चंद्रमौली शशि के अनुसार 1947 के सांप्रदायिक तनाव के दौरान उन्होंने कई मुस्लिम परिवारों की रक्षा करते हुए उन्हें सुरक्षित फतुहा पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
स्थानीय लोगों के अनुसार महात्मा गांधी भी फतेहपुर पहुंचे थे और मध्य विद्यालय फतेहपुर के आसपास उनकी सभा हुई थी। राजेंद्र प्रसाद और विनोबा भावे जैसे राष्ट्रीय नेताओं के फतेहपुर आने की चर्चा भी स्थानीय इतिहास का हिस्सा है। स्वतंत्रता सेनानियों के वंशज आज भी समाजसेवा, शिक्षा, सेना, कानून और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से गांव की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। केदार सिंह ‘केदार बाबा’ क्षत्रिय उच्च माध्यमिक विद्यालय फतेहपुर के प्रधानाध्यापक रहे, जबकि उनके पुत्र चुन्नी सिंह रंगमंच से जुड़े हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि फतेहपुर की इस ऐतिहासिक विरासत को दस्तावेज के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में स्मारक या संग्रहालय विकसित कर नई पीढ़ी को उनके संघर्ष और बलिदान से परिचित कराया जा सकता है।
इसी दिन पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने निकले निहत्थे छात्रों पर अंग्रेजी हुकूमत ने गोली चला दी थी, जिसमें सात युवा शहीद हुए। अमर शहीदों में रामानंद सिंह, उमाकांत प्रसाद सिंह, सतीश प्रसाद झा, जितिन कुमार सिंह, राजेंद्र सिंह, रामगोपति सिंह और देवी पद चौधरी शामिल थे।
स्थानीय इतिहास में फतेहपुर के कई स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान भी दर्ज है। इनमें रमन बिहारी सिंह उर्फ ‘गांधी जी’, जगदीश सिंह, चंदेश्वर प्रसाद सिंह उर्फ ‘आजाद साहब’, राम नेवाजी सिंह, विश्वनाथ सिंह, लालदेव सिंह, तोताराम और केदार सिंह उर्फ ‘केदार बाबा’ के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। रमन बिहारी सिंह को गांव में सम्मानपूर्वक ‘गांधी जी’ कहा जाता था। उनके पौत्र चंद्रमौली शशि के अनुसार 1947 के सांप्रदायिक तनाव के दौरान उन्होंने कई मुस्लिम परिवारों की रक्षा करते हुए उन्हें सुरक्षित फतुहा पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
स्थानीय लोगों के अनुसार महात्मा गांधी भी फतेहपुर पहुंचे थे और मध्य विद्यालय फतेहपुर के आसपास उनकी सभा हुई थी। राजेंद्र प्रसाद और विनोबा भावे जैसे राष्ट्रीय नेताओं के फतेहपुर आने की चर्चा भी स्थानीय इतिहास का हिस्सा है। स्वतंत्रता सेनानियों के वंशज आज भी समाजसेवा, शिक्षा, सेना, कानून और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से गांव की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। केदार सिंह ‘केदार बाबा’ क्षत्रिय उच्च माध्यमिक विद्यालय फतेहपुर के प्रधानाध्यापक रहे, जबकि उनके पुत्र चुन्नी सिंह रंगमंच से जुड़े हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि फतेहपुर की इस ऐतिहासिक विरासत को दस्तावेज के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृति में स्मारक या संग्रहालय विकसित कर नई पीढ़ी को उनके संघर्ष और बलिदान से परिचित कराया जा सकता है।