📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Roksenhorn
स्वास्थ्य
ड्रोन से डिफाइब्रिलेटर – कार्डियक अरेस्ट में नई जान बचाव
✍️ Amar Ujala
🗓 27 सित. 2026, 10:50 AM
👁 11
भारत में ड्रोन द्वारा ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफाइब्रिलेटर (AED) पहुंचाने के प्रायोगिक कार्यक्रम से कार्डियक अरेस्ट में प्रतिक्रिया समय घटाने की उम्मीद है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक घरेलू तकनीकी स्टार्ट‑अप के साथ मिलकर कार्डियक अरेस्ट की स्थिति में एईडी‑सज्जित ड्रोन भेजने के लिए पायलट परियोजना शुरू की है। यह पहल वर्तमान में कुछ जिलों में परीक्षण के चरण में है और आपातकालीन कॉल के तीन से पाँच मिनट के भीतर डिफाइब्रिलेटर पहुँचाने का लक्ष्य रखती है, जो सामान्य एंबुलेंस के औसत आगमन समय से काफी तेज़ है।
परम्परागत एंबुलेंस को चालक, वाहन रख‑रखाव और सड़कों की स्थिति की आवश्यकता होती है, जबकि ड्रोन जीपीएस के माध्यम से कॉलकर्ता या पास के बायपासर द्वारा दी गई सटीक निर्देशांक तक स्वतः पहुंचते हैं। स्थल पर पहुँचने पर ड्रोन एक छोटे पैराशूट में पैक किया हुआ एईडी नीचे गिराता है और बिल्ट‑इन स्पीकर से कॉलकर्ता को सीपीआर शुरू करने का निर्देश देता है।
स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि प्रारम्भिक डिफाइब्रिलेशन से जीवित रहने की दर 5‑10 % से बढ़कर पाँच मिनट के भीतर 30 % से अधिक हो सकती है। इस कार्यक्रम में सार्वजनिक जागरूकता भी शामिल है, जिसमें स्वयंसेवकों को बुनियादी सीपीआर और एईडी उपयोग की ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि तेज़ डिलीवरी का अधिकतम लाभ मिल सके।
पायलट परीक्षण में प्रतिक्रिया समय में कमी और रोगी परिणामों में सुधार सिद्ध होने पर, मंत्रालय इस सेवा को बड़े शहरी क्षेत्रों में विस्तारित करने और अंततः उन ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू करने की योजना बना रहा है जहाँ एंबुलेंस कवरेज सीमित है।
परम्परागत एंबुलेंस को चालक, वाहन रख‑रखाव और सड़कों की स्थिति की आवश्यकता होती है, जबकि ड्रोन जीपीएस के माध्यम से कॉलकर्ता या पास के बायपासर द्वारा दी गई सटीक निर्देशांक तक स्वतः पहुंचते हैं। स्थल पर पहुँचने पर ड्रोन एक छोटे पैराशूट में पैक किया हुआ एईडी नीचे गिराता है और बिल्ट‑इन स्पीकर से कॉलकर्ता को सीपीआर शुरू करने का निर्देश देता है।
स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि प्रारम्भिक डिफाइब्रिलेशन से जीवित रहने की दर 5‑10 % से बढ़कर पाँच मिनट के भीतर 30 % से अधिक हो सकती है। इस कार्यक्रम में सार्वजनिक जागरूकता भी शामिल है, जिसमें स्वयंसेवकों को बुनियादी सीपीआर और एईडी उपयोग की ट्रेनिंग दी जाएगी ताकि तेज़ डिलीवरी का अधिकतम लाभ मिल सके।
पायलट परीक्षण में प्रतिक्रिया समय में कमी और रोगी परिणामों में सुधार सिद्ध होने पर, मंत्रालय इस सेवा को बड़े शहरी क्षेत्रों में विस्तारित करने और अंततः उन ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू करने की योजना बना रहा है जहाँ एंबुलेंस कवरेज सीमित है।