📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Dsrprj
धर्म
धीरेंद्र शास्त्री ने सोने की खड़ाऊं विवाद पर दांव परखा, डायमंड की खड़ाऊं की चेतावनी
✍️ Amar Ujala · Madhya Pradesh
🗓 20 सित. 2026, 06:31 PM
👁 14
बाबा बागेश्वर धाम प्रमुख धीरेंद्र शास्त्री ने सोने की खड़ाऊं को लेकर आलोचना का तीखा जवाब दिया, अगले बार डायमंड की खड़ाऊं बुक करेंगे कहा।
बाबा बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र शास्त्री ने धाम में स्थापित सोने की खड़ाऊं को लेकर उठे विवाद पर अपना जवाब दिया। उन्होंने आलोचकों की बातों को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले को वे अपनी शर्तों पर ही सुलझाएंगे।
शास्त्री ने आगे कहा कि यदि भविष्य में किसी को नई खड़ाऊं की मांग करनी पड़ी तो वह सोने की बजाय डायमंड की खड़ाऊं बुक करेंगे, जिससे उनका संदेश स्पष्ट हो गया कि वे इस मुद्दे को हल्के में नहीं ले रहे हैं। यह टिप्पणी मध्य प्रदेश में एक प्रेस मीटिंग के दौरान की गई।
सोने की खड़ाऊं को कुछ भक्तों ने श्रद्धा का प्रतीक माना, जबकि अन्य ने इसके खर्च और उपयोगिता पर सवाल उठाए। शास्त्री ने इस विवाद को हल्का करने के लिए चुटीले अंदाज़ में जवाब दिया, साथ ही धार्मिक मामलों में अपनी अधिकारिता को भी दोहराया।
धाम के प्रबंधन निकाय से इस विवाद या शास्त्री के बयान पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। यह मुद्दा स्थानीय लोगों और धार्मिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
यह घटना परंपरा, वित्तीय विवेक और समकालीन भारत में भक्तों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती को उजागर करती है।
शास्त्री ने आगे कहा कि यदि भविष्य में किसी को नई खड़ाऊं की मांग करनी पड़ी तो वह सोने की बजाय डायमंड की खड़ाऊं बुक करेंगे, जिससे उनका संदेश स्पष्ट हो गया कि वे इस मुद्दे को हल्के में नहीं ले रहे हैं। यह टिप्पणी मध्य प्रदेश में एक प्रेस मीटिंग के दौरान की गई।
सोने की खड़ाऊं को कुछ भक्तों ने श्रद्धा का प्रतीक माना, जबकि अन्य ने इसके खर्च और उपयोगिता पर सवाल उठाए। शास्त्री ने इस विवाद को हल्का करने के लिए चुटीले अंदाज़ में जवाब दिया, साथ ही धार्मिक मामलों में अपनी अधिकारिता को भी दोहराया।
धाम के प्रबंधन निकाय से इस विवाद या शास्त्री के बयान पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। यह मुद्दा स्थानीय लोगों और धार्मिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
यह घटना परंपरा, वित्तीय विवेक और समकालीन भारत में भक्तों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती को उजागर करती है।