📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / U.S. Department of State from United States
शिक्षा
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में बदलाव: 17 साल में घटा भीड़, सख्त धन‑बाहु‑बल नियम
✍️ Amar Ujala · Delhi
🗓 30 अग. 2026, 02:18 PM
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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव ने अब पहले जैसी भीड़ और रौनक नहीं दिखायी, 17 साल में धन‑बाहु‑बल पर कड़ी रोक के बाद।
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव ने पिछले सत्र में अपने रूप‑रंग में स्पष्ट बदलाव दिखाया है। पहले जहाँ भारी भीड़, रंग‑बिरंगी रैलियां और जोश‑जज्बा दिखता था, अब वही दृश्य नहीं दिख रहा है।
पर्यवेक्षकों ने बताया कि अब चुनाव प्रचार में भीड़ की संख्या और रौनक में कमी आई है। यह परिवर्तन धन‑बाहु‑बल पर कड़ी रोक के बाद आया है, जहाँ विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र संघ ने खर्चे और शारीरिक दबाव को सीमित करने के लिए कड़े नियम लागू किए हैं।
नए नियमों के तहत अत्यधिक खर्च और बल प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है, जिससे चुनाव प्रक्रिया अधिक नियंत्रित और शांतिपूर्ण हो गई है। आयोजक अब इन दिशानिर्देशों का पालन कर रहे हैं, जिससे कैंपस में माहौल पहले की तुलना में अधिक विनियमित दिख रहा है।
विवेचनकर्ता इस बदलाव को निष्पक्षता की दिशा में एक सकारात्मक कदम मानते हैं, जबकि कुछ अनुभवी छात्रों ने कहा कि पारंपरिक उत्साह और जोश की कमी महसूस हो रही है। यह बदलाव भारतीय कैंपस राजनीति में पारदर्शिता और समानता की ओर बढ़ते रुझान को दर्शाता है।
आगामी चुनाव इन सुधारों की स्थिरता को परखेंगे, जहाँ उम्मीदवारों को वित्तीय शक्ति और शारीरिक उपस्थिति के बजाय नीतियों और छात्र सहभागिता पर अधिक ध्यान देना होगा।
पर्यवेक्षकों ने बताया कि अब चुनाव प्रचार में भीड़ की संख्या और रौनक में कमी आई है। यह परिवर्तन धन‑बाहु‑बल पर कड़ी रोक के बाद आया है, जहाँ विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र संघ ने खर्चे और शारीरिक दबाव को सीमित करने के लिए कड़े नियम लागू किए हैं।
नए नियमों के तहत अत्यधिक खर्च और बल प्रयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है, जिससे चुनाव प्रक्रिया अधिक नियंत्रित और शांतिपूर्ण हो गई है। आयोजक अब इन दिशानिर्देशों का पालन कर रहे हैं, जिससे कैंपस में माहौल पहले की तुलना में अधिक विनियमित दिख रहा है।
विवेचनकर्ता इस बदलाव को निष्पक्षता की दिशा में एक सकारात्मक कदम मानते हैं, जबकि कुछ अनुभवी छात्रों ने कहा कि पारंपरिक उत्साह और जोश की कमी महसूस हो रही है। यह बदलाव भारतीय कैंपस राजनीति में पारदर्शिता और समानता की ओर बढ़ते रुझान को दर्शाता है।
आगामी चुनाव इन सुधारों की स्थिरता को परखेंगे, जहाँ उम्मीदवारों को वित्तीय शक्ति और शारीरिक उपस्थिति के बजाय नीतियों और छात्र सहभागिता पर अधिक ध्यान देना होगा।