📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Avrajyoti Mitra
टेक्नोलॉजी
दिल्ली हाईकोर्ट में सोशल मीडिया की लत‑बढ़ाने वाली डिजाइन पर जनहित याचिका
✍️ Amar Ujala · Delhi
🗓 09 सित. 2026, 09:47 PM
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दिल्ली हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका सोशल मीडिया के 'इनफिनिट स्क्रॉल' और 'ऑटोप्ले' जैसी लत‑बढ़ाने वाली सुविधाओं की जांच और विशेषज्ञ समिति की स्थापना की मांग करती है।
दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म की कुछ डिज़ाइन विशेषताओं को लत‑बढ़ाने वाला कहा गया है। याचिका में विशेष रूप से 'इनफिनिट स्क्रॉल' और 'ऑटोप्ले' जैसी सुविधाओं को उजागर किया गया है, जो उपयोगकर्ता को बिना इरादे के लंबे समय तक प्लेटफ़ॉर्म पर रखती हैं।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि ये डिज़ाइन मनोवैज्ञानिक ट्रिगर का फायदा उठाते हैं, जिससे विशेषकर युवा वर्ग के उपयोगकर्ता कंटेंट से खुद को अलग नहीं कर पाते। निरंतर फ़ीड और स्वतः चलने वाले वीडियो एक फीडबैक लूप बनाते हैं, जिससे स्क्रीन टाइम बढ़ता है और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
इस समस्या के समाधान के लिए याचिका में एक विशेषज्ञ समिति की स्थापना की मांग की गई है, जिसमें तकनीकी विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक और उपभोक्ता अधिकारों के प्रतिनिधि शामिल हों। समिति को इन सुविधाओं के प्रभावों का अध्ययन, नियामक दिशा‑निर्देश तैयार करने और सरकार को संभावित हस्तक्षेपों पर सलाह देने का काम सौंपा जाएगा।
कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला डिजिटल वेल‑बीइंग पर राष्ट्रीय स्तर पर चल रही चर्चा को दर्शाता है। हाईकोर्ट का निर्णय भविष्य में तकनीकी कंपनियों की लत‑बढ़ाने वाली डिज़ाइन पर नियामक कार्रवाई के लिए मिसाल बन सकता है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि ये डिज़ाइन मनोवैज्ञानिक ट्रिगर का फायदा उठाते हैं, जिससे विशेषकर युवा वर्ग के उपयोगकर्ता कंटेंट से खुद को अलग नहीं कर पाते। निरंतर फ़ीड और स्वतः चलने वाले वीडियो एक फीडबैक लूप बनाते हैं, जिससे स्क्रीन टाइम बढ़ता है और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
इस समस्या के समाधान के लिए याचिका में एक विशेषज्ञ समिति की स्थापना की मांग की गई है, जिसमें तकनीकी विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक और उपभोक्ता अधिकारों के प्रतिनिधि शामिल हों। समिति को इन सुविधाओं के प्रभावों का अध्ययन, नियामक दिशा‑निर्देश तैयार करने और सरकार को संभावित हस्तक्षेपों पर सलाह देने का काम सौंपा जाएगा।
कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला डिजिटल वेल‑बीइंग पर राष्ट्रीय स्तर पर चल रही चर्चा को दर्शाता है। हाईकोर्ट का निर्णय भविष्य में तकनीकी कंपनियों की लत‑बढ़ाने वाली डिज़ाइन पर नियामक कार्रवाई के लिए मिसाल बन सकता है।