📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / ARTIST/MAKER
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स्थानीय
टोंक के नौ नवाबों का पूरा शिजरा 125 साल बाद संकलित
✍️ Amar Ujala · Rajasthan
🗓 09 अक्टू. 2026, 10:36 PM
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पहली बार टोंक के नौ नवाबों की पूरी वंशावली एक ही दस्तावेज़ में संकलित की गई है, जो 1901 की उर्दू पुस्तक 'हदीका‑ए‑राजस्थान टोंक' में दी गई सीमित जानकारी को विस्तारित करती है।
टोंक रियासत के नौ नवाबों की वंशावली को एकत्र करने का काम शोधकर्ताओं और टोंक शाही परिवार के सदस्यों ने किया है। विभिन्न दस्तावेज़, पारिवारिक अभिलेख और मौखिक इतिहास को मिलाकर एक ही शिजरा तैयार किया गया है, जिसमें सभी नौ नवाबों की संतान‑संतान का विवरण सम्मिलित है।
इससे पहले केवल 1901 में प्रकाशित उर्दू पुस्तक 'हदीका‑ए‑राजस्थान टोंक' में चार नवाबों के परिवारों का संक्षिप्त उल्लेख था, जिससे वंशावली का बड़ा हिस्सा अस्पष्ट रह गया था। नई संकलन में प्रत्येक नवाब, उनके जीवनसाथी, संतति और प्रमुख विवाह संबंधों को विस्तृत रूप से दर्शाया गया है, जिससे एक सदी से अधिक समय में मौजूद अंतराल भर गया है।
इतिहासकारों का मानना है कि यह विस्तृत शिजरा राजस्थान के फ्यूडल इतिहास के अध्ययन में उपयोगी सिद्ध होगा और वंशजों को अपने गौरवशाली अतीत की स्पष्ट समझ प्रदान करेगा। इस दस्तावेज़ को जयपुर और टोंक के पुस्तकालयों तथा सांस्कृतिक संस्थानों में उपलब्ध कराया जाएगा।
यह पहल क्षेत्रीय शाही इतिहास को संरक्षित करने की बढ़ती रुचि को दर्शाती है, जहाँ कई वंशावली अभी भी अपूर्ण या बिखरी हुई हैं। शिजरा के प्रसार से टोंक नवाबों की सांस्कृतिक धरोहर पर भविष्य में प्रदर्शनी और शोध कार्यों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
इससे पहले केवल 1901 में प्रकाशित उर्दू पुस्तक 'हदीका‑ए‑राजस्थान टोंक' में चार नवाबों के परिवारों का संक्षिप्त उल्लेख था, जिससे वंशावली का बड़ा हिस्सा अस्पष्ट रह गया था। नई संकलन में प्रत्येक नवाब, उनके जीवनसाथी, संतति और प्रमुख विवाह संबंधों को विस्तृत रूप से दर्शाया गया है, जिससे एक सदी से अधिक समय में मौजूद अंतराल भर गया है।
इतिहासकारों का मानना है कि यह विस्तृत शिजरा राजस्थान के फ्यूडल इतिहास के अध्ययन में उपयोगी सिद्ध होगा और वंशजों को अपने गौरवशाली अतीत की स्पष्ट समझ प्रदान करेगा। इस दस्तावेज़ को जयपुर और टोंक के पुस्तकालयों तथा सांस्कृतिक संस्थानों में उपलब्ध कराया जाएगा।
यह पहल क्षेत्रीय शाही इतिहास को संरक्षित करने की बढ़ती रुचि को दर्शाती है, जहाँ कई वंशावली अभी भी अपूर्ण या बिखरी हुई हैं। शिजरा के प्रसार से टोंक नवाबों की सांस्कृतिक धरोहर पर भविष्य में प्रदर्शनी और शोध कार्यों को प्रोत्साहन मिल सकता है।