📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Hemant banswal
मौसम
चीन के 27,000 क्लाउड‑सीडिंग प्रयोग, दिल्ली में दोहराने की संभावना पर विशेषज्ञों का विश्लेषण
✍️ India Today
🗓 07 नव. 2026, 11:35 PM
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चीन ने लगभग 27,000 बार क्लाउड‑सीडिंग की है। भारतीय मौसम विशेषज्ञ दिल्ली की जल‑कमी को दूर करने में इस तकनीक की संभावनाओं पर चर्चा कर रहे हैं।
चीन ने पिछले दशकों में लगभग 27,000 क्लाउड‑सीडिंग अभियानों को अंजाम दिया है, जिसका उद्देश्य शुष्क क्षेत्रों में वर्षा बढ़ाना और सूखे को कम करना है। इस बड़े पैमाने के प्रयास ने दिल्ली में अस्थिर मानसून और लगातार जल‑कमी से जूझ रहे भारतीय वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है।
दिल्ली की नगरपालिका ने पहले भी भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने के लिए कृत्रिम वर्षा के विकल्पों की खोज की थी। हालिया मानसून की कमी ने क्लाउड‑सीडिंग को एक संभावित उपाय के रूप में फिर से सामने लाया, जिससे पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने विशेषज्ञों से राय ली।
भारतीय मौसम विज्ञानी यह रेखांकित करते हैं कि बुनियादी सिद्धांत—हायग्रोस्कोपिक कणों को बिखेर कर संघनन को प्रोत्साहित करना—समान है, परन्तु यहाँ की वायुमंडलीय स्थितियां चीन के उत्तरी मैदानों से काफी भिन्न हैं। तापमान अंतर, एयरोसोल की मात्रा और prevailing wind दिशा जैसी बातों से सफलता की संभावना प्रभावित होगी।
लागत और नियामक पहलू भी चर्चा में प्रमुख हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के ऊपर विमानों या ड्रोन द्वारा सीडिंग करने के लिए हवाई क्षेत्र की स्पष्ट अनुमति और विमानन प्राधिकरण के साथ समन्वय आवश्यक होगा। प्रारम्भिक अनुमान के अनुसार एक पायलट प्रोग्राम का खर्च कई करोड़ रुपये हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्री‑मानसून अवधि में एक छोटे स्तर का परीक्षण करना उचित रहेगा, जिससे क्लाउड माइक्रोफिज़िक्स पर डेटा इकट्ठा कर तकनीक की प्रभावशीलता का आकलन किया जा सके, उसके बाद ही बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन पर विचार किया जा सकता है।
दिल्ली की नगरपालिका ने पहले भी भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने के लिए कृत्रिम वर्षा के विकल्पों की खोज की थी। हालिया मानसून की कमी ने क्लाउड‑सीडिंग को एक संभावित उपाय के रूप में फिर से सामने लाया, जिससे पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने विशेषज्ञों से राय ली।
भारतीय मौसम विज्ञानी यह रेखांकित करते हैं कि बुनियादी सिद्धांत—हायग्रोस्कोपिक कणों को बिखेर कर संघनन को प्रोत्साहित करना—समान है, परन्तु यहाँ की वायुमंडलीय स्थितियां चीन के उत्तरी मैदानों से काफी भिन्न हैं। तापमान अंतर, एयरोसोल की मात्रा और prevailing wind दिशा जैसी बातों से सफलता की संभावना प्रभावित होगी।
लागत और नियामक पहलू भी चर्चा में प्रमुख हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के ऊपर विमानों या ड्रोन द्वारा सीडिंग करने के लिए हवाई क्षेत्र की स्पष्ट अनुमति और विमानन प्राधिकरण के साथ समन्वय आवश्यक होगा। प्रारम्भिक अनुमान के अनुसार एक पायलट प्रोग्राम का खर्च कई करोड़ रुपये हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्री‑मानसून अवधि में एक छोटे स्तर का परीक्षण करना उचित रहेगा, जिससे क्लाउड माइक्रोफिज़िक्स पर डेटा इकट्ठा कर तकनीक की प्रभावशीलता का आकलन किया जा सके, उसके बाद ही बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन पर विचार किया जा सकता है।