📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / swap
अपराध
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने डॉ. बी.आर. पर इंस्टाग्राम टिप्पणियों के लिए महिला पर SC/ST अधिनियम के मामले को खारिज करने से इनकार किया
✍️ Live Law
🗓 07 अग. 2026, 04:37 PM
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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने डॉ. बी.आर. पर इंस्टाग्राम टिप्पणियों के लिए महिला पर SC/ST अधिनियम के तहत दायर मामले को खारिज करने से इनकार कर दिया।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने मंगलवार को डॉ. बी.आर. पर इंस्टाग्राम टिप्पणियों के लिए महिला पर SC/ST (पूर्वाग्रह रोकथाम) अधिनियम के तहत दायर मामले को खारिज करने से इनकार कर दिया। इस निर्णय से मामला जीवित रहा और अभियोजन पक्ष आगे बढ़ सकता है।
यह मामला SC/ST अधिनियम के अंतर्गत दायर किया गया था, जो अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्यों को अपमानित करने वाले कार्यों को अपराध बनाता है। महिला के इंस्टाग्राम टिप्पणियों को डॉ. बी.आर. के प्रति अपमानजनक माना गया, और न्यायालय ने नोट किया कि ऐसी टिप्पणियाँ SC/ST समुदाय के प्रति अपमान के रूप में देखी जा सकती हैं।
खारिज न करने के निर्णय से न्यायालय ने आगामी महीनों में मामले की सुनवाई के लिए रास्ता साफ कर दिया है। महिला को अदालत में उपस्थित होकर आरोपों का सामना करना पड़ेगा।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि SC/ST अधिनियम का प्रयोग उन स्थितियों में किया जाता है जहाँ कथित टिप्पणियाँ घृणास्पद या भेदभावपूर्ण मानी जाती हैं। न्यायालय का यह निर्णय इस बात को दर्शाता है कि अदालत ऐसी दावों की गहराई से जाँच करने के लिए तैयार है।
यह फैसला स्वतंत्र अभिव्यक्ति और अल्पसंख्यक समुदायों के संरक्षण के बीच चल रहे बहस में भी योगदान देता है। महिला उच्च न्यायालय के निर्णय को उच्चतर अदालत में अपील कर सकती है।
यह मामला SC/ST अधिनियम के अंतर्गत दायर किया गया था, जो अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्यों को अपमानित करने वाले कार्यों को अपराध बनाता है। महिला के इंस्टाग्राम टिप्पणियों को डॉ. बी.आर. के प्रति अपमानजनक माना गया, और न्यायालय ने नोट किया कि ऐसी टिप्पणियाँ SC/ST समुदाय के प्रति अपमान के रूप में देखी जा सकती हैं।
खारिज न करने के निर्णय से न्यायालय ने आगामी महीनों में मामले की सुनवाई के लिए रास्ता साफ कर दिया है। महिला को अदालत में उपस्थित होकर आरोपों का सामना करना पड़ेगा।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि SC/ST अधिनियम का प्रयोग उन स्थितियों में किया जाता है जहाँ कथित टिप्पणियाँ घृणास्पद या भेदभावपूर्ण मानी जाती हैं। न्यायालय का यह निर्णय इस बात को दर्शाता है कि अदालत ऐसी दावों की गहराई से जाँच करने के लिए तैयार है।
यह फैसला स्वतंत्र अभिव्यक्ति और अल्पसंख्यक समुदायों के संरक्षण के बीच चल रहे बहस में भी योगदान देता है। महिला उच्च न्यायालय के निर्णय को उच्चतर अदालत में अपील कर सकती है।