📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Amiyashrivastava (talk) (Uploads)
स्वास्थ्य
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पति की उम्र सीमा पार होने पर भी दंपति को आईवीएफ की अनुमति दी
✍️ Law Trend
🗓 09 अक्टू. 2026, 07:36 AM
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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि पति की आयु सीमा से अधिक होने पर भी दंपति को आईवीएफ उपचार मिल सकता है, जिससे प्रजनन अधिकारों को बल मिला।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह कहा कि पति की आयु कानूनी सीमा से अधिक होने पर भी विवाहित दंपति को इन‑विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (आईवीएफ) उपचार मिल सकता है। कोर्ट ने सहायक प्रजनन तकनीक के लिये निर्धारित आयु सीमा को व्यक्तिगत अधिकारों के सामने बाधा नहीं माना।
दंपति ने आयु सीमा को मनमाना और प्रजनन अधिकारों के उल्लंघन के रूप में चुनौती दी थी। न्यायालय ने यह कहा कि आधुनिक चिकित्सा ने प्रजनन क्षमता को बढ़ा दिया है और कानून को उपचार तक पहुँच को अनावश्यक रूप से सीमित नहीं करना चाहिए।
आदेश में संबंधित फर्टिलिटी क्लिनिक को मानक चिकित्सा जांच के बाद आईवीएफ प्रक्रिया जारी रखने का निर्देश दिया गया और राज्य स्वास्थ्य विभाग को सहायक प्रजनन दिशा‑निर्देशों में आयु‑संबंधी प्रावधानों की समीक्षा करने का कहा गया। यह फैसला भारत में समान मामलों पर प्रभाव डाल सकता है, जहाँ आयु सीमा अभी भी विवाद का विषय है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय मौजूदा नियम को निरस्त नहीं करता, पर व्यक्तिगत अधिकार और चिकित्सा संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए उसकी व्याख्या में नया मानदंड स्थापित करता है। यह मामला नियामक ढाँचों और उन्नत प्रजनन तकनीकों के बीच बढ़ते तनाव को उजागर करता है।
न्यायालय का यह रुख व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ विधायी मानकों को संतुलित करने की इच्छा को दर्शाता है, जिससे भविष्य में सहायक प्रजनन के लिये आयु प्रतिबंधों पर पुनर्विचार हो सकता है।
दंपति ने आयु सीमा को मनमाना और प्रजनन अधिकारों के उल्लंघन के रूप में चुनौती दी थी। न्यायालय ने यह कहा कि आधुनिक चिकित्सा ने प्रजनन क्षमता को बढ़ा दिया है और कानून को उपचार तक पहुँच को अनावश्यक रूप से सीमित नहीं करना चाहिए।
आदेश में संबंधित फर्टिलिटी क्लिनिक को मानक चिकित्सा जांच के बाद आईवीएफ प्रक्रिया जारी रखने का निर्देश दिया गया और राज्य स्वास्थ्य विभाग को सहायक प्रजनन दिशा‑निर्देशों में आयु‑संबंधी प्रावधानों की समीक्षा करने का कहा गया। यह फैसला भारत में समान मामलों पर प्रभाव डाल सकता है, जहाँ आयु सीमा अभी भी विवाद का विषय है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय मौजूदा नियम को निरस्त नहीं करता, पर व्यक्तिगत अधिकार और चिकित्सा संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए उसकी व्याख्या में नया मानदंड स्थापित करता है। यह मामला नियामक ढाँचों और उन्नत प्रजनन तकनीकों के बीच बढ़ते तनाव को उजागर करता है।
न्यायालय का यह रुख व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ विधायी मानकों को संतुलित करने की इच्छा को दर्शाता है, जिससे भविष्य में सहायक प्रजनन के लिये आयु प्रतिबंधों पर पुनर्विचार हो सकता है।