📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / A.Savin
धर्म
बिहार के गयाजी के लाल मोहरिया पंडों का नेपाल राजघराने से जुड़ाव, जम्होर में पिंडदान की परम्परा
✍️ Amar Ujala · Bihar
🗓 26 सित. 2026, 07:45 AM
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गयाजी के लाल मोहरिया पंडों का नेपाल राजघराने से संबंध बताया गया है, और जम्होर, औरंगाबाद में इनके वंशज आज भी पिंडदान की परम्परा निभा रहे हैं।
बिहार के गयाजी मंदिर में सेवा करने वाले लाल मोहरिया पंडों का वंश, नेपाल के राजघराने से जुड़ाव का दावा करता है। स्थानीय इतिहासकारों और बुजुर्गों के अनुसार, कई शताब्दियों पहले कुछ ब्राह्मण पुजारी नेपाल के दरबार द्वारा शाही अनुष्ठान करने के लिए आमंत्रित किए गए थे और बाद में वे आज के औरंगाबाद जिले के जम्होर गाँव में बस गए।
जम्होर में मौखिक परम्पराओं के अनुसार, इन पुजारियों को नेपाल के शासकों ने "राजपुरोहित" का पद प्रदान किया, जिससे वे शाही अनुष्ठानों के प्रमुख बन गए। यह उपाधि और उससे जुड़ी विशेषाधिकार पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते रहे, जिससे दो देशों के बीच सांस्कृतिक संबंध गहरा हुआ।
वर्तमान में इस वंशजों ने पिंडदान समारोह को जारी रखा है, जो गयाजी मंदिर और जम्होर के निजी देवस्थलों में वार्षिक रूप से किया जाता है। यह अनुष्ठान पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का पारम्परिक तरीका है और परिवार की शाही विरासत के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
विद्वानों का मानना है कि इस प्रकार की सीमा‑पार पुजारियों की कड़ियाँ हिमालयी क्षेत्र में सांस्कृतिक और धार्मिक आदान‑प्रदान की लचीलापन को उजागर करती हैं। लाल मोहरिया पंड आज भी इस साझा इतिहास की जीवंत गवाही हैं, जो भक्तों और शोधकर्ताओं दोनों का ध्यान आकर्षित करती हैं।
जम्होर में मौखिक परम्पराओं के अनुसार, इन पुजारियों को नेपाल के शासकों ने "राजपुरोहित" का पद प्रदान किया, जिससे वे शाही अनुष्ठानों के प्रमुख बन गए। यह उपाधि और उससे जुड़ी विशेषाधिकार पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते रहे, जिससे दो देशों के बीच सांस्कृतिक संबंध गहरा हुआ।
वर्तमान में इस वंशजों ने पिंडदान समारोह को जारी रखा है, जो गयाजी मंदिर और जम्होर के निजी देवस्थलों में वार्षिक रूप से किया जाता है। यह अनुष्ठान पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का पारम्परिक तरीका है और परिवार की शाही विरासत के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
विद्वानों का मानना है कि इस प्रकार की सीमा‑पार पुजारियों की कड़ियाँ हिमालयी क्षेत्र में सांस्कृतिक और धार्मिक आदान‑प्रदान की लचीलापन को उजागर करती हैं। लाल मोहरिया पंड आज भी इस साझा इतिहास की जीवंत गवाही हैं, जो भक्तों और शोधकर्ताओं दोनों का ध्यान आकर्षित करती हैं।