📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / India Post, Government of India
राजनीति
बिहार, ओडिशा के सार्वजनिक मांग अधिनियम में वसीयत के बाद उत्तराधिकारियों से देरी से वसूली पर रोक
✍️ Live Law
🗓 31 जुल. 2026, 02:34 PM
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बिहार और ओडिशा में सार्वजनिक मांग अधिनियम अब वर्षों के बाद वसीयत के उत्तराधिकारियों से देरी से वसूली पर रोक लगाता है, जिससे कानूनी विशेषज्ञों और प्रभावित परिवारों के बीच चर्चा बढ़ रही है।
नया संशोधित सार्वजनिक मांग अधिनियम बिहार और ओडिशा में एक प्रावधान जोड़ता है जो निर्दिष्ट अवधि के बाद कानूनी उत्तराधिकारियों से देयता वसूली पर रोक लगाता है। इस बदलाव का अर्थ है कि यदि किसी ऋणदाता को देयता वसूलने के लिए समय सीमा समाप्त होने के बाद दावा करना पड़े, तो वह दावा मृतक के उत्तराधिकारियों के खिलाफ नहीं किया जा सकता।
इस संशोधन का उद्देश्य परिवारों के लिए अधिक निश्चितता प्रदान करना और पश्चात्‑मृत्यु मुकदमों के बोझ को कम करना है। फिर भी, यह चिंता पैदा करता है कि ऋणदाता बिना किसी उपाय के रह सकते हैं, खासकर उन मामलों में जहां ऋण लंबे समय तक बकाया रहता है।
कानूनी विश्लेषकों की राय मिश्रित है। कुछ का मानना है कि यह प्रावधान उत्तराधिकारियों को अनावश्यक वित्तीय दबाव से बचाता है, जबकि अन्य चेतावनी देते हैं कि इससे ऋणदाताओं को वसूली में देरी करने का प्रोत्साहन मिल सकता है, जिससे संविदात्मक दायित्वों के प्रवर्तन पर असर पड़ सकता है।
कानून अब ऋणदाताओं को वैधानिक समय सीमा के भीतर कार्य करने के लिए बाध्य करता है, और किसी भी विलंबित दावे को अदालतों द्वारा खारिज कर दिया जाएगा। हितधारक आगामी मामलों में न्यायालयों द्वारा इस नए प्रावधान की व्याख्या और प्रवर्तन पर नजर रख रहे हैं।
इस संशोधन का उद्देश्य परिवारों के लिए अधिक निश्चितता प्रदान करना और पश्चात्‑मृत्यु मुकदमों के बोझ को कम करना है। फिर भी, यह चिंता पैदा करता है कि ऋणदाता बिना किसी उपाय के रह सकते हैं, खासकर उन मामलों में जहां ऋण लंबे समय तक बकाया रहता है।
कानूनी विश्लेषकों की राय मिश्रित है। कुछ का मानना है कि यह प्रावधान उत्तराधिकारियों को अनावश्यक वित्तीय दबाव से बचाता है, जबकि अन्य चेतावनी देते हैं कि इससे ऋणदाताओं को वसूली में देरी करने का प्रोत्साहन मिल सकता है, जिससे संविदात्मक दायित्वों के प्रवर्तन पर असर पड़ सकता है।
कानून अब ऋणदाताओं को वैधानिक समय सीमा के भीतर कार्य करने के लिए बाध्य करता है, और किसी भी विलंबित दावे को अदालतों द्वारा खारिज कर दिया जाएगा। हितधारक आगामी मामलों में न्यायालयों द्वारा इस नए प्रावधान की व्याख्या और प्रवर्तन पर नजर रख रहे हैं।