📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Sashikant rai 123
स्थानीय
बड़े तालाब में अतिक्रमण बना, NGT के 7 आदेशों के बाद भी, याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट की तैयारी की
✍️ Amar Ujala · Bhopal
🗓 29 अग. 2026, 07:17 PM
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NGT के सात आदेशों के बाद भी भोपाल के बड़े तालाब में अतिक्रमण बना हुआ है; 365 चिन्हित उल्लंघनों पर कार्रवाई अधूरी, याचिकाकर्ता राशिद नूर ने नई सर्वेक्षण की मांग की और सुप्रीम कोर्ट जाने की चेतावनी दी।
इतिहासिक बड़े तालाब, जो भोपाल के शहर के मध्य में स्थित है, ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) के सात आदेशों के बावजूद अतिक्रमण की समस्या से जूझते हुए देखा है। इन आदेशों का उद्देश्य तालाब की मूल सीमा को पुनर्स्थापित करना था, परंतु जमीन पर पूर्ण कार्यवाही नहीं हो पाई है।
नवीनतम निगरानी रिपोर्ट के अनुसार तालाब के चारों ओर 365 अतिक्रमणों की पहचान की गई, परन्तु इन सभी को हटाने का काम अभी अधूरा है। स्थानीय प्राधिकरणों ने केवल कुछ ही चिन्हित संरचनाओं को हटाया है, जिससे तालाब के बड़े हिस्से अभी भी अनधिकृत निर्माणों से घिरे हुए हैं।
याचिकाकर्ता राशिद नूर ने हालिया बारिश के बाद तालाब की वास्तविक सीमाओं को स्पष्ट करने के लिए सर्वेक्षण की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि तुरंत सर्वेक्षण और अतिक्रमण हटाने के कदम नहीं उठाए गए, तो वह इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे।
NGT ने अभी तक नई अनुपालन समयसीमा नहीं जारी की है, और भोपाल के अधिकारियों ने बताया है कि कानूनी व व्यावहारिक चुनौतियों के कारण पूर्ण कार्यवाही में देरी हो रही है। यह स्थिति पर्यावरणीय आदेशों को व्यावहारिक रूप से लागू करने की कठिनाइयों को उजागर करती है।
नवीनतम निगरानी रिपोर्ट के अनुसार तालाब के चारों ओर 365 अतिक्रमणों की पहचान की गई, परन्तु इन सभी को हटाने का काम अभी अधूरा है। स्थानीय प्राधिकरणों ने केवल कुछ ही चिन्हित संरचनाओं को हटाया है, जिससे तालाब के बड़े हिस्से अभी भी अनधिकृत निर्माणों से घिरे हुए हैं।
याचिकाकर्ता राशिद नूर ने हालिया बारिश के बाद तालाब की वास्तविक सीमाओं को स्पष्ट करने के लिए सर्वेक्षण की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि तुरंत सर्वेक्षण और अतिक्रमण हटाने के कदम नहीं उठाए गए, तो वह इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे।
NGT ने अभी तक नई अनुपालन समयसीमा नहीं जारी की है, और भोपाल के अधिकारियों ने बताया है कि कानूनी व व्यावहारिक चुनौतियों के कारण पूर्ण कार्यवाही में देरी हो रही है। यह स्थिति पर्यावरणीय आदेशों को व्यावहारिक रूप से लागू करने की कठिनाइयों को उजागर करती है।