📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Rishab Dugar Jain
धर्म
बाड़मेर की रुचिका मालू ने सीए का सपना छोड़ आचार्य महाश्रमण से लाडनूं में दीक्षा ली
✍️ Amar Ujala · Rajasthan
🗓 20 सित. 2026, 11:31 AM
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बाड़मेर की रुचिका मालू, जो चार्टर्ड अकाउंटेंट की पढ़ाई कर रही थीं, ने सांसारिक जीवन त्याग कर लाडनूं में आचार्य महाश्रमण से दीक्षा ली।
बाड़मेर, राजस्थान की रहने वाली रुचिका मालू चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) की कठिन पढ़ाई कर रही थीं और इस पेशे में करियर बनाने का लक्ष्य रखती थीं। उनका यह प्रयास स्थानीय स्तर पर सराहा जाता था, क्योंकि कई युवा इसी तरह के पेशेवर सपने देखते हैं।
हालांकि, मालू ने अचानक यह घोषणा की कि वह अपने सीए के सपने को त्याग कर आध्यात्मिक संयम की राह अपनाएंगी। उन्होंने सांसारिक इच्छाओं को छोड़कर एक कठोर तपस्या‑आधारित जीवन जीने का इरादा व्यक्त किया।
दीक्षा समारोह लाडनूं में आयोजित हुआ, जो अपने आध्यात्मिक इतिहास के लिए प्रसिद्ध शहर है। वहाँ आचार्य महाश्रमण, जैन संन्यासी संघ के प्रमुख, ने मालू को औपचारिक रूप से दीक्षा दी, जिससे वह संन्यासी जीवन में प्रवेश कर गईं। इस अनुष्ठान में अहिंसा, ब्रह्मचर्य और संसार से अलगाव के व्रत शामिल थे, जो जैन परम्परा के मानक हैं।
परिवार और स्थानीय लोगों ने इस कार्यक्रम को देखा, और मालू के दृढ़ संकल्प की सराहना की। जबकि उनका निर्णय कई लोगों को आश्चर्यचकित कर गया, यह दर्शाता है कि आज के कई भारतीय पेशेवर लक्ष्य से आगे आध्यात्मिक संतुष्टि की ओर रुख कर रहे हैं।
मालू का यह परिवर्तन भारत में आज भी जीवित रहने वाली संन्यासी परम्पराओं की प्रासंगिकता को उजागर करता है, जहाँ व्यक्तिगत विश्वास पेशेवर आकांक्षाओं को पीछे छोड़ कर जीवन भर के धार्मिक प्रतिबद्धता में बदल सकता है।
हालांकि, मालू ने अचानक यह घोषणा की कि वह अपने सीए के सपने को त्याग कर आध्यात्मिक संयम की राह अपनाएंगी। उन्होंने सांसारिक इच्छाओं को छोड़कर एक कठोर तपस्या‑आधारित जीवन जीने का इरादा व्यक्त किया।
दीक्षा समारोह लाडनूं में आयोजित हुआ, जो अपने आध्यात्मिक इतिहास के लिए प्रसिद्ध शहर है। वहाँ आचार्य महाश्रमण, जैन संन्यासी संघ के प्रमुख, ने मालू को औपचारिक रूप से दीक्षा दी, जिससे वह संन्यासी जीवन में प्रवेश कर गईं। इस अनुष्ठान में अहिंसा, ब्रह्मचर्य और संसार से अलगाव के व्रत शामिल थे, जो जैन परम्परा के मानक हैं।
परिवार और स्थानीय लोगों ने इस कार्यक्रम को देखा, और मालू के दृढ़ संकल्प की सराहना की। जबकि उनका निर्णय कई लोगों को आश्चर्यचकित कर गया, यह दर्शाता है कि आज के कई भारतीय पेशेवर लक्ष्य से आगे आध्यात्मिक संतुष्टि की ओर रुख कर रहे हैं।
मालू का यह परिवर्तन भारत में आज भी जीवित रहने वाली संन्यासी परम्पराओं की प्रासंगिकता को उजागर करता है, जहाँ व्यक्तिगत विश्वास पेशेवर आकांक्षाओं को पीछे छोड़ कर जीवन भर के धार्मिक प्रतिबद्धता में बदल सकता है।