📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / C. Achilles
अपराध
बाबली खातून को दो साल के बेटे की हत्या के आरोप में 5 साल बाद बरी किया गया
✍️ Amar Ujala · Bihar
🗓 28 अग. 2026, 10:47 AM
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बिहार के छपरा व्यवहार न्यायालय ने साक्ष्य की कमी के कारण बाबली खातून को बरी कर दिया, जिन्हें दो साल के बेटे की हत्या का आरोप था और पांच साल से अधिक जेल में रहे।
बिहार के छपरा व्यवहार न्यायालय ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें बाबली खातून को दो साल के बेटे की हत्या के आरोप में पांच साल से अधिक समय जेल में रहने के बाद बरी कर दिया गया। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने उन्हें अपराध से जोड़ने वाला कोई ठोस सबूत नहीं पेश किया, जिससे बरी करने का आदेश दिया गया।
खातून को 2018 की शुरुआत में अपने नाबालिग बेटे की अनसुलझी मौत के बाद गिरफ्तार किया गया था और उसे पाँच साल की सजा सुनाई गई थी। जेल में रहने के दौरान उनके परिवार और समर्थकों ने उनकी निरपराधता का दावा किया, पर केस में फोरेंसिक रिपोर्ट और गवाहियों की कमी बनी रही।
सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने बताया कि न तो विश्वसनीय फोरेंसिक प्रमाण, न ही गवाहियों या किसी भी सामग्री सबूत ने हत्या के आरोप को सिद्ध किया। इसलिए, अदालत ने तुरंत रिहाई का आदेश दिया और जेल रेकॉर्ड को अद्यतन करने का निर्देश दिया।
मानवाधिकार संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया, इसे आपराधिक मामलों में साक्ष्य मानकों की कड़ाई की आवश्यकता के रूप में बताया। बरी होने से प्रदेश में समान मामलों में पूर्व परीक्षण हिरासत की लंबी अवधि पर पुनर्विचार की संभावना भी उत्पन्न हुई।
खातून को 2018 की शुरुआत में अपने नाबालिग बेटे की अनसुलझी मौत के बाद गिरफ्तार किया गया था और उसे पाँच साल की सजा सुनाई गई थी। जेल में रहने के दौरान उनके परिवार और समर्थकों ने उनकी निरपराधता का दावा किया, पर केस में फोरेंसिक रिपोर्ट और गवाहियों की कमी बनी रही।
सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने बताया कि न तो विश्वसनीय फोरेंसिक प्रमाण, न ही गवाहियों या किसी भी सामग्री सबूत ने हत्या के आरोप को सिद्ध किया। इसलिए, अदालत ने तुरंत रिहाई का आदेश दिया और जेल रेकॉर्ड को अद्यतन करने का निर्देश दिया।
मानवाधिकार संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया, इसे आपराधिक मामलों में साक्ष्य मानकों की कड़ाई की आवश्यकता के रूप में बताया। बरी होने से प्रदेश में समान मामलों में पूर्व परीक्षण हिरासत की लंबी अवधि पर पुनर्विचार की संभावना भी उत्पन्न हुई।