🔥 TRENDING Congress Delegation Visits Jamui Over... Nitish Kumar Nominates Neeraj for Biha... Seven women drown at Maner’s Ganga gha... Congress Flags Repeated Power Outages... Lok Sabha Chairman Om Birla Arrives in... Star Actor Donates Ramayana Film Proce...
23 Sep 2026
ગુજરાતી मराठी ਪੰਜਾਬੀ বাংলা
अगस्त क्रांति की अनसुनी गाथा
Local

अगस्त क्रांति की अनसुनी गाथा

✍️ Reporter: Ankit Raj 🗓 11 Aug 2026, 11:56 AM 👁 102
Share: 💬 WhatsApp 📘 Facebook 𝕏 Post

दुल्हिन बाजार के काब गांव से निकला किशोर, तिरंगा फहराने पहुंचा बिक्रम थाना और अंग्रेज कप्तान पर दे मारा पत्थर, सिर में गोली लगी तो देश की मिट्टी में मिलकर हो गया अमर

आजादी की लड़ाई उन अनगिनत वीर सपूतों का भी योगदान है, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की। ऐसे ही एक वीर बालक थे त्रिवेणी सिंह, जिन्होंने महज 15 वर्ष की उम्र में देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिया। पटना से करीब 25 किलोमीटर दूर दुल्हिन बाजार के काब गांव निवासी त्रिवेणी सिंह की शहादत आज भी इलाके के लोगों के लिए गर्व और प्रेरणा का विषय है।
परिवार के लोगों के अनुसार त्रिवेणी सिंह का जन्म वर्ष 1927 में हुआ था। वर्ष 1942 में जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन का बिगुल बजा तो पूरे देश में आजादी की लहर दौड़ गई। उस समय त्रिवेणी सिंह महज 15 वर्ष के छात्र थे, लेकिन उनके भीतर देश को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराने का जुनून था।
17 अगस्त 1942 की सुबह करीब आठ बजे त्रिवेणी सिंह ने घर पर नाश्ता किया। इसके बाद परिवार के लोगों को बिना कुछ बताए अपने कुछ साथियों के साथ घर से निकल पड़े। उनका मकसद था बिक्रम थाना परिसर में घुसकर अंग्रेजी हुकूमत के सामने तिरंगा फहराना।
साथियों के साथ छिपते-छिपाते त्रिवेणी सिंह थाना के नजदीक पहुंच गए। इसी दौरान वहां मौजूद एक अंग्रेज कप्तान की नजर उन पर पड़ गई। अंग्रेज अधिकारी ने उन्हें रोकने की कोशिश की। लेकिन देश की आजादी के जुनून से भरे किशोर त्रिवेणी सिंह पीछे हटने को तैयार नहीं थे।
परिवार के लोगों के अनुसार उन्होंने सड़क किनारे पड़ा एक पत्थर उठाया और अंग्रेज कप्तान की ओर फेंक दिया। पत्थर अंग्रेज कप्तान के सिर में जा लगा और उसके सिर से खून बहने लगा। घटना के बाद वहां मौजूद अंग्रेज पुलिसकर्मियों में अफरा-तफरी मच गई।
अंग्रेज सिपाहियों ने त्रिवेणी सिंह को निशाना बनाकर गोली चला दी। परिवार के लोगों के मुताबिक गोली उनके सिर में लगी और वे वहीं शहीद हो गए। जिस उम्र में बच्चे अपने भविष्य के सपने देखते हैं, उस उम्र में त्रिवेणी सिंह ने भारत की आजादी को अपना सबसे बड़ा सपना बना लिया था और उसी के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया।
उनका पार्थिव शरीर बाद में परिवार के लोगों को सौंप दिया गया। शहादत की खबर जैसे ही घर पहुंची, पूरे परिवार में कोहराम मच गया।
उनके पोता सतेंद्र सिंह, सतीश कुमार और रामकिशोर शर्मा बताते हैं कि दादा( त्रिवेणी सिंह) की शादी घटना से करीब तीन वर्ष पहले हुई थी। उस दौर में समाज में कई ऐसी परंपराएं थीं, जिनके कारण विवाह के बाद भी पति-पत्नी एक-दूसरे का चेहरा नहीं देखते थे। परिवार के लोगों का कहना है कि त्रिवेणी सिंह अपनी पत्नी ( मुनाकि कुंवर )का चेहरा तक नहीं देख पाए थे।
जब उनकी शहादत की खबर पत्नी और परिवार तक पहुंची तो घर में मातम छा गया। एक ओर देश ने अपना वीर सपूत खो दिया था, तो दूसरी ओर परिवार ने अपना बेटा और पति। उनकी पत्नी तब से शहीद विधवा की जिंदगी जीती रही। वर्ष 2022 में उनकी पत्नी का देहांत हो गया।
देश आजाद हुआ तो त्रिवेणी सिंह जैसे अनगिनत गुमनाम और स्थानीय शहीदों के बलिदान को याद किया गया। बिक्रम के शहीद चौक पर त्रिवेणी सिंह का नाम अमर शहीद के रूप में सुनहरे अक्षरों में अंकित है।
हर वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को काब गांव और आसपास के लोग बिक्रम शहीद चौक पर पहुंचकर त्रिवेणी सिंह सहित आजादी की लड़ाई में शहीद हुए वीर सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
महज 15 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने वाले त्रिवेणी सिंह की कहानी आज भी यह याद दिलाती है कि देश की आजादी केवल एक आंदोलन का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे हजारों युवाओं, छात्रों और आम लोगों का साहस और बलिदान छिपा था।
अमर शहीद त्रिवेणी सिंह : एक नजर में
नाम : त्रिवेणी सिंह( छात्र)
पिता : बलकेश सिंह(किसान)
पत्नी : मुनाकी कुंवर
जन्म : 1927
गांव : काब, दुल्हिन बाजार (पटना)
उम्र : करीब 15 वर्ष
समय : भारत छोड़ो आंदोलन, 1942
मकसद : बिक्रम थाना परिसर में तिरंगा फहराना
शहादत : अंग्रेजी पुलिस की गोली से शहीद
स्मृति : बिक्रम शहीद चौक पर नाम अंकित
श्रद्धांजलि : प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को
📲Get App