📷 चित्र स्रोत: Wikimedia Commons / Ashishlohorung
स्थानीय
पटवारी संध्या शर्मा ने दो साल के बेटे को साथ लेकर स्वामित्व योजना के लिए गांवों में काम किया, कलेक्टर ने सराहा
✍️ Amar Ujala · Madhya Pradesh
🗓 29 अक्टू. 2026, 05:16 PM
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शिवपुरी की पटवारी संध्या शर्मा अपने दो साल के बेटे को साथ लेकर स्वामित्व योजना के तहत गांवों में काम कर रही हैं, जिसे कलेक्टर अर्पित वर्मा ने सराहा है।
शिवपुरी जिले की पटवारी संध्या शर्मा ने स्वामित्व योजना के तहत अपने दो साल के बेटे को साथ लेकर गांवों में काम किया है। वह विभिन्न गांवों का दौरा कर निवासियों से मिलती हैं और संपत्ति अधिकारों के पंजीकरण की देखरेख करती हैं, जो भूमि विवादों को कम करने के लिए सरकार की प्रमुख योजना है।
उनके इस प्रयास को वरिष्ठ अधिकारी भी सराह रहे हैं। जिला कलेक्टर अर्पित वर्मा ने सार्वजनिक रूप से उनकी प्रतिबद्धता की प्रशंसा की और कहा कि काम और मातृत्व को संतुलित करने की उनकी क्षमता अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए एक सकारात्मक उदाहरण है।
पटवारी की यह कार्यशैली ग्रामीण क्षेत्रों में महिला कर्मचारियों को झेलनी पड़ने वाली चुनौतियों को उजागर करती है। बच्चा साथ लेकर काम करने से यह स्पष्ट होता है कि पेशेवर जिम्मेदारियों और माता‑पिता की देखभाल को साथ‑साथ निभाया जा सकता है, जिससे सरकार के लैंगिक‑समावेशी कार्यस्थल के लक्ष्य को बल मिलता है।
स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि इस अभ्यास से योजना की समयसीमा पर कोई असर नहीं पड़ा है और ग्रामीण लोगों ने अपनी पटवारी की इस प्रतिबद्धता को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया है। जिला प्रशासन इस प्रकार की पहलों को दस्तावेज़ित कर कर्मचारियों के लिए कार्य‑जीवन संतुलन नीतियों को बढ़ावा देने की योजना बना रहा है।
शर्मा की कहानी उन कई महिला अधिकारियों की कहानी को दर्शाती है जो कठिन भूमिकाओं को निभाते हुए छोटे बच्चों की देखभाल भी करती हैं, जिससे भारत में प्रशासनिक माहौल में सामाजिक अपेक्षाओं में बदलाव का संकेत मिलता है।
उनके इस प्रयास को वरिष्ठ अधिकारी भी सराह रहे हैं। जिला कलेक्टर अर्पित वर्मा ने सार्वजनिक रूप से उनकी प्रतिबद्धता की प्रशंसा की और कहा कि काम और मातृत्व को संतुलित करने की उनकी क्षमता अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए एक सकारात्मक उदाहरण है।
पटवारी की यह कार्यशैली ग्रामीण क्षेत्रों में महिला कर्मचारियों को झेलनी पड़ने वाली चुनौतियों को उजागर करती है। बच्चा साथ लेकर काम करने से यह स्पष्ट होता है कि पेशेवर जिम्मेदारियों और माता‑पिता की देखभाल को साथ‑साथ निभाया जा सकता है, जिससे सरकार के लैंगिक‑समावेशी कार्यस्थल के लक्ष्य को बल मिलता है।
स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि इस अभ्यास से योजना की समयसीमा पर कोई असर नहीं पड़ा है और ग्रामीण लोगों ने अपनी पटवारी की इस प्रतिबद्धता को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया है। जिला प्रशासन इस प्रकार की पहलों को दस्तावेज़ित कर कर्मचारियों के लिए कार्य‑जीवन संतुलन नीतियों को बढ़ावा देने की योजना बना रहा है।
शर्मा की कहानी उन कई महिला अधिकारियों की कहानी को दर्शाती है जो कठिन भूमिकाओं को निभाते हुए छोटे बच्चों की देखभाल भी करती हैं, जिससे भारत में प्रशासनिक माहौल में सामाजिक अपेक्षाओं में बदलाव का संकेत मिलता है।